धर्मराजस्थानसामाजिक/ धार्मिकसूरत सिटी

कठिनाइयों में भी रहे निर्भीकता : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

मेरु की तरह अकंपमान रहे विषय पर पूज्यप्रवर ने प्रदान किया मार्गदर्शन- एनडीआरएफ जवानों को प्राप्त हुआ गुरुदेव का शुभाशीष

29.06.2026, सोमवार, लाडनूं।जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज सुधर्मा सभा में अपने पावन प्रवचन में ‘मेरु की तरह अकंपमान रहे’ विषय पर व्याख्या करते हुए जैन तत्व विद्या के गूढ़ रहस्यों को व्यावहारिक जीवन, कुशल नेतृत्व और आत्म-प्रबंधन से जोड़ते मार्गदर्शन प्रदान किया। आचार्य श्री ने अध्यात्म साधना की सर्वोच्च अवस्था अयोग संवर और शैलेशी अवस्था की व्याख्या करते हुए बताया कि किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में भी एक साधक, एक गृहस्थ और एक कुशल नेतृत्वकर्ता को मेरु पर्वत की भाँति अडिग और निष्कंप रहना चाहिए।

तत्व विद्या के 14 जीव स्थानों को गुणस्थान कहा जाता है, जहाँ जीव के गुणों को देखा जाता है। इन गुणस्थानों में आरोहण सीधे तौर पर आश्रव के घटने और संवर के बढ़ने से होता है, जैसे-जैसे मिथ्यात्व, अव्रत और प्रमाद कम होते हैं, जीव का ग्राफ ऊँचा बढ़ता है। आठवें गुणस्थान से दो मार्ग निकलते हैं एक उपशम श्रेणी, जो ग्यारहवें गुणस्थान की बंद गली से जीव को वापस नीचे गिरा देती है और दूसरा क्षपक श्रेणी, जिससे जीव कषायों का नाश कर सीधा बारहवें और फिर तेरहवें गुणस्थान में पहुँच जाता है। तेरहवें गुणस्थान में कषाय और राग-द्वेष न होने के कारण केवली भगवान से यदि बाह्य रूप में कोई जीव हिंसा भी हो जाए, तो भी उन्हें पाप का बंध नहीं होता क्योंकि वहाँ मोह कर्म नहीं है। अंत में, योग आश्रव का भी पूर्ण निरोध होने पर जीव चौदहवें गुणस्थान की शैलेशी अवस्था को प्राप्त कर मेरु पर्वत के समान पूर्णतः अप्रकंप और अकंप हो जाता है।

आचार्य श्री ने आगे कहा कि योग और अयोग दो शब्द हैं। जहाँ योग का अर्थ शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति है, वहीं साधना की परम अवस्था अयोग संवर यानी चौदहवाँ गुणस्थान है, जहाँ जीव को योग से अयोग की ओर, परम निवृत्ति की ओर बढ़ना होता है। इस अयोग संवर की साधना के लिए आगम में मेरु पर्वत की तरह अप्रकंप और कछुए की तरह अपने अंगों को भीतर समेटकर आत्म-गुप्त रहने की प्रेरणा दी गई है, ताकि मोह रूपी सियार संयम को नुकसान न पहुँचा सके। साधु को मेरु की तरह अकंप रहकर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी जैसे परिषहों को समता भाव और दृढ़ मनोबल से सहन करना चाहिए। साथ रहने वाले लोगों की अलग-अलग प्रकृतियों, कमियों और कटु वचनों के प्रहारों को भी झेलना एक बड़ी साधना है। स्वयं की चित्त समाधि हमारे अपने ही हाथ में है। हमारा व्यवहार दूसरों और शत्रुओं के साथ भी मैत्रीपूर्ण होना चाहिए। यदि अतीत में किसी से संबंध अच्छे नहीं भी रहे हों, तो भी सेवा के प्रसंग में उन पिछली बातों को गौण करके अस्वस्थ व्यक्ति की सेवा करनी चाहिए क्योंकि यही निर्जरा की असली कमाई है। जब कोई व्यक्ति सत्ता या बड़े दायित्व पर आता है, तो अतीत की त्रुटियों को भुलाकर विरोधियों को भी उनकी योग्यता के अनुसार स्नेह व निकटता देकर साथ जोड़ना चाहिए, ताकि किसी को भी यह अहसास न हो कि हमारे संभालने वाले चले गए तो अब हमारा कौन है। अतः जीवन में कितनी ही कठिनाइयाँ, संघर्ष या प्रतिकूलताएँ आ जाएँ, मनुष्य को सही रास्ते पर चलते हुए निर्भीक और अडिग रहना चाहिए।

तत्पश्चात अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के महामंत्री सौरभ पटावरी ने अपने विचार रखे। विशेष कार्यशाला हेतु आमंत्रित एनडीआरएफ के जवानों का अभातेयुप एवं जैन विश्व भारती, व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों ने सम्मान किया। आचार्यप्रवर ने जवानों को शुभाशीष प्रदान किया।

*

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button