तेरापंथ भवन सिटीलाइट में 60 भाई-बहनों ने किया वर्षीतप तपस्या का पारणा।
मुनि श्री डॉ. मदनकुमारजी, शासनश्री साध्वी श्री मधुबालाजी एवं साध्वी श्री डॉ. परमयशाजी का प्राप्त हुआ पावन सान्निध्य।

जैन परम्परा में वर्षीतप तपस्या का बड़ा महत्त्व है। जैन धर्मावलंबी भगवान ऋषभदेव द्वारा लगभग 400 दिन तक की गई निराहार तपस्या की स्मृति में 13 महीने तक एकांतर तप की साधना (वर्षीतप) करते हैं जिसका अक्षय तृतीया पर समापन होता है।
तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में लाडनूं (राजस्थान) में 450 से भी अधिक भाई-बहनों ने वर्षीतप तपस्या के पारणे पूज्य गुरुदेव को इक्षुरस (गन्ने का रस) का दान देकर किए। सूरत में भी उनके सुशिष्य मुनि श्री डॉ. मदनकुमारजी, शासनश्री साध्वी श्री मधुबालाजी एवं साध्वी श्री डॉ. परमयशाजी के मंगल सान्निध्य में तेरापंथ भवन, सिटीलाइट में लगभग 60 भाई-बहनों ने अपनी वर्षीतप तपस्या का अति उल्लास के साथ समापन किया।
इस अवसर पर उपस्थित तपस्वियों और विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री डॉ. मदनकुमारजी ने कहा— “भगवान ऋषभ जैन परम्परा के प्रथम तीर्थंकर थे। उन्होंने तेरह महीने तक निराहार-निर्जल तपस्या की। वर्तमान में वैसी तपस्या तो संभव नहीं है, फिर भी जैन धर्मावलंबी अपने आराध्य की स्मृति में 13 महीने तक एकांतर तप करते हैं जिसे वर्षीतप साधना कहा जाता है। यह तपस्या सचमुच बहुत कठिन है। ऐसी तपस्या से आत्मा निर्मल बनती है, कंचन जैसी विशुद्ध बन जाती है। इससे पूर्वसंचित कर्मों का क्षय होता है। व्यक्ति का चारित्र और वीतरागता की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। आदमी को खाने से आनंद मिल सकता है लेकिन तपस्या से परमानंद की प्राप्ति हो सकती है।” मुनि श्री कलपकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति की।
“शासन श्री” साध्वी श्री मधुबालाजी ने कहा— “वर्षीतप की तपस्या बड़ी कठिन तपस्या है। तपस्या कर्मक्षय का अमोघ साधन है। तपस्या के द्वारा मन की चंचलता पर अंकुश प्राप्त किया जा सकता है। वर्षित अप तपस्या करने वाले भाई बहनों ने बड़े साहस और जैन शासन के प्रति श्रद्धा का परिचय दिया है। उन्हें बहुत-बहुत बधाइयां एवं उज्जवल भविष्य की हार्दिक मंगल कामना। तपस्वी भाई-बहन तप के मार्ग पर आगे बढ़ते रहें।”
साध्वी श्री डॉ. परमयशाजी ने कहा— “भगवान ऋषभ एक अद्भुत साधक थे। वे इस सृष्टि के प्रथम राजा बने, प्रथम साधु बने और प्रथम तीर्थंकर बने। उन्होंने असि, मसि और कृषि सिखाई। वर्षीतप तपस्वी आत्मशुद्धि के इस मार्ग पर चलना जारी रखें और तपस्या के संदर्भ में सादगी से पारणा करें, कोई आडंबर-प्रदर्शन न करें।”
उन्होंने कहा – हमारी सहवर्ती साध्वी श्री कुमुदप्रभाजी ने भी वर्षीतप किया है, यह उनका तीसरा वर्षीतप है। उनको बहुत-बहुत बधाई एवं मंगलकामना।
साध्वी परिवार ने “सबसे प्यारा, सबसे न्यारा वर्षीतप है मोहनगारा” गीत की सुमधुर प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
तेरापंथी सभा, सूरत के अध्यक्ष श्री हजारीमलजी भोगर ने स्वागत वक्तव्य दिया। साध्वी श्री कुमुदप्रभाजी के संसारपक्षीय परिवारजनों ने भी मधुर गीत की प्रस्तुति दी। तेरापंथ महिला मंडल ने मंगलाचरण किया।
परवत पाटिया सभा के अध्यक्ष, अणुव्रत विश्व भारती के अर्जुनजी मेड़तवाल, तेयुप सूरत अध्यक्ष श्री नमन मेड़तवाल आदि ने अपने भाव व्यक्त किए।
कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी श्री मंजुलयशाजी एवं तेरापंथ सभा सूरत के मंत्री श्री महेंद्र गांधी मेहता ने किया। सभी तपस्वियों ने मुनि श्री एवं साध्वी श्री को प्रसन्न वदन से इक्षू रस का सुपात्र दान देते हुए अपनी तपस्या का पारणा किया।




