Textileराजस्थानलोकल न्यूज़सामाजिक/ धार्मिकसूरत सिटी

महामना भिक्षु स्वामी ने प्रवाहित की साहित्य सरिता : महातपस्वी महाश्रमण 

भिक्षु चेतना वर्ष: सम्पन्नता समारोह का द्वितीय दिवस

साध्वीप्रमुखाजी व मुख्यमुनिश्री ने महामना भिक्षु स्वामी का किया गुणगान

साध्वीवृंद व समणीवृंद ने गीत को दी प्रस्तुति

22वें राष्ट्रीय कन्या मण्डल अधिवेशन की संभागियों को मिला शांतिदूत का मंगल आशीष

26.07.2026, रविवार, लाडनूं :

भिक्षु चेतना वर्ष का त्रिदिवसीय समापन समारोह का द्वितीय दिवस। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में उमड़ता आस्था, भक्ति व श्रद्धा का ज्वार। विराट धवल सेना और बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुवृंद। सभी तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, जनक, महामना आचार्यश्री भिक्षु के प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति को आतुर नजर आ रहे हैं। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल प्रवास से जैन विश्व भारती परिसर किसी तीर्थस्थल के समान बना हुआ है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां अपने जीवन को आध्यात्मिकता से भावित बनाने हेतु पहुंचे हुए हैं। ऐसे में तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष को ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के रूप में अभिहित करने वाले ग्यारहवें पट्टधर आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में समापन समारोह मानों दिव्य रूप में समायोजित हो रहा है।

रविवार को भिक्षु चेतना वर्ष के चतुर्थ चरण का दूसरा दिवस था। आज का निर्धारित विषय था- आचार्य भिक्षु का साहित्य संसार। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सुधर्मा सभा में मानों श्रद्धा का ज्वार दिखाई दे रहा था। प्रज्ञा गीत के उपरान्त साध्वीवृंद ने भिक्षुअष्टकम् के शेष चार चरणों का संगान किया।

तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषयानुसार पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष की सम्पन्नता का त्रिदिवसीय समारोह का मध्यवर्ती दिवस है। जहां एक ओर परम पूजनीय आचार्यश्री भिक्षुजी का ज्ञान वैभव है तो वहीं दूसरी ओर उनका साहित्य संसार भी है। ज्ञान और साहित्य दोनों का संबंध है। अच्छे साहित्य की रचना के लिए अच्छे ज्ञान की आवश्यकता होती है। ज्ञान और वैदुष्य नहीं है, तो रचना कोई कर भी दे उसमें वह गांभीर्य नहीं आ सकता। साहित्य की आत्मा तो मानों साहित्यकार का ज्ञान होता है। ऐसा ग्रन्थ हो, जिसके माध्यम से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हो सके, वह बड़ी बात होती है। कोई निर्ग्रन्थ ऐसा ग्रन्थ निर्मित करे तो कितनी विशेष बात हो सकती है। एक निर्ग्रन्थ साधु द्वारा ऐसा साहित्य का सृजन होना खास बात होती है। साधु होना एक बात है और ज्ञानी साधु होना एक बात होती है। सभी साधु के पास इतना ज्ञान हो, ऐसा संभव नहीं हो सकता।

साहित्य की स्वाध्याय से एक संस्कृति को आगे से आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि साहित्य न हो तो धीरे-धीरे वह ज्ञान या संस्कृति लुप्त हो सकती है। वर्तमान समय में साहित्य के माध्यम से संस्कृति को परंपरागत रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है। आचार्यश्री भिक्षु की आचार संपदा जितनी उत्तम है, वहीं दूसरी ओर उनकी ज्ञान विभूति भी बहुत उत्तम है। तीसरी ओर उनका साहित्य संसार भी है। तेरापंथ धर्मसंघ में साहित्य की बहुत अच्छी स्थिति है।                                                                                                           

आचार्यश्री भिक्षु एक साहित्यकार पुरुष थे। जिनका राजस्थानी भाषा में कितना साहित्य है। आचार्यश्री भिक्षु का आचार साहित्य भी है, आख्यान साहित्य भी है। उनका तत्त्व साहित्य को देखा जा सकता है। आचार की चौपई, बारह व्रत के संदर्भ में, इन्द्रियवादी, कालवादी कितने साहित्य हैं। उन्होंने साहित्य सरिता प्रवाहित की, ऐसी उनकी विशेष क्षमता थी। आचार्यश्री भिक्षु व श्रीमज्जयाचार्य राजस्थानी भाषा के साहित्यकारों में सामने आते हैं। परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को भी साहित्य के क्षेत्र में देख सकते हैं। स्वामीजी के साहित्य को पढ़ने का प्रयास होना चाहिए। लाडनूं का भण्डार संघीय साहित्य की दृष्टि से अद्वितीय है। आचार्यश्री भिक्षु, श्रीमज्जयाचार्य, आचार्यश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को साहित्य सृजक के रूप में भी देख सकते हैं। उनमें सबसे पहले आचार्यश्री भिक्षु हैं। उनका मानों कितना बड़ा साहित्य संसार है। साहित्य सृजन के लिए ज्ञान का गहरा होना बहुत बड़ी बात है। भिक्षु स्वामी की भिक्षु वाणी कंठस्थ की जा सकती है। हम सभी ज्ञान और आचार साधना की दिशा में आगे बढ़ते रहें, यह काम्य है।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने आचार्यश्री भिक्षु के प्रति अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी महामना आचार्यश्री भिक्षु के जीवन वृतांतों का वर्णन करते हुए उनके प्रति अपनी विनयांजलि अर्पित की। समणीवृंद ने गीत का संगान किया।

आचार्यश्री के मंगलपाठ के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के तत्त्वावधान में आयोजित 22वें राष्ट्रीय कन्या मण्डल अधिवेशन का मंचीय उपक्रम आयोजित हुआ, जिसमें अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ कन्या मण्डल ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तदुपरान्त आचार्यश्री ने अधिवेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button