भिक्षु चेतना वर्ष : सम्पन्नता समारोह का भव्य आध्यात्मिक शुभारम्भ
11वें अनुशास्ता महातपस्वी महाश्रमण की मंगल सन्निधि में उमड़ा चतुर्विध धर्मसंघ

आचार्यश्री भिक्षु में था अद्भुत ज्ञान का वैभव : युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण
साध्वीवर्याजी ने भी महामना भिक्षु को अर्पित की विनयांजलि
लाडनूं महिला मण्डल, साध्वीवृंद व संतवृंद ने भी गीत को दी प्रस्तुति
25.07.2026, शनिवार, लाडनूं :
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, महामना आचार्यश्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत ‘भिक्षु चेतना वर्ष का चतुर्थ चरण अर्थात् समापन समारोह के त्रिदिवसीय कार्यक्रम का शुभारम्भ जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती परिसर में बने सुधर्मा सभा में हुआ। आज का विषय भी आचार्य भिक्षु का ज्ञान वैभव रहा। चतुर्विध धर्मसंघ में उत्साह माहौल दिखाई दे रहा था। प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ के मध्य युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी पधारे तो पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त मुनिवृन्द ने भिक्षुअष्टकम् के प्रथम चार चरणों का संगान किया। तत्पश्चात् तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘आचार्य भिक्षु का ज्ञान वैभव’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु जन्मत्रिशताब्दी वर्ष का चतुर्थ चरण अंतिम चरण है। लगभग एक वर्ष पूर्व यह आयोजन प्रारम्भ हुआ था। इस दौरान हमारा आचार्यश्री भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में जाना हुआ और वहां तेरह रात्रियों का प्रवास भी हुआ। वहां आयोजित कार्यक्रम महाचरण के रूप में समायोजित हुआ था।
आचार्यश्री भिक्षु के जीवन में जहां आस्था, श्रद्धा का दर्शन हो सकता है। महावीर वाणी और आगमवाणी के प्रति उनके भीतर जो सम्मान का भाव था, अद्भुत था। आगम पढ़ना एक बात और उसके प्रति श्रद्धा और सम्मान की बात विशेष है और उसके बाद उसकी गहराई में जाना हो सके तो वह संभवतः और विशेष बात हो सकती है। आचार्यश्री भिक्षु में वह प्रतिभा-प्रज्ञा थी, जो गहराई में जाने वाली थी। परम पूजनीय आचार्यश्री भिक्षु में मानों ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम था। उनके ग्रन्थों का देखा जाए और उसका मंथन हो तो कितना ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
आचार्यश्री भिक्षु का ज्ञान वैभव विशिष्ट था। उनके समझाने की शैली भी विशिष्ट थी। उनका सैद्धांतिक ज्ञान और निर्भीकता रही होगी। बहुत स्पष्ट बात कह देते थे। वे हमारे धर्मसंघ के परमपिता, जनक हैं। आचार्यश्री भिक्षु का प्रभाव जयाचार्यजी के साहित्य में भी देखा जा सकता है और उनकी गीतिकाओं में देखा जा सकता है। भिक्षु जश रसायण के माध्यम से उनके ज्ञान वैभव को जाना जा सकता है। आचार्यश्री भिक्षु के ज्ञान वैभव के माध्यम से आत्मसात करने का प्रयास किया जा सकता है।
साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने आचार्यश्री भिक्षु के प्रति अपनी श्रद्धासिक्त अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं ने गीत का संगान किया। मुमुक्षु बहनों ने इस अवसर पर गीत का संगान किया। कांठा क्षेत्र से संबद्ध साध्वीवृंद ने भी गीत के माध्यम से अपने आराध्य के प्रति अपनी श्रद्धाप्रणति अर्पित की।




