पद्म पत्र की तरह अलिप्त रहे साधु : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्यश्री ने निर्धारित विषय को आगम के माध्यम से किया विवेचित

श्रावक समाज को बारह व्रत की दी पावन प्रेरणा
शांतिदूत ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को किया उत्तरित
22.07.2026, बुधवार, लाडनूं :
जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘पद्म की तरह अलिप्त रहें’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि दूसरों के कल्याण के लिए उपदेश देना बहुत अच्छी बात होती है। साधु यदि ऐसा सन्मार्ग दिखाता है तो उसके लिए कितनी अच्छी बात हो सकती है। व्यापारी, चिकित्सक, शिक्षक, वकील, इंजीनियर, सीए आदि का लोगों को सहयोग मिलता है तो उसके बदले में उन्हें कुछ धन के रूप में सहयोग मिलता है तो व्यापारी से वस्तु, चिकित्सक से रोग का निदान, शिक्षक से ज्ञान, वकील से कोई परामर्श, इंजीनियर से निर्माण आदि तो सीए से कोई ऑडिट आदि के रूप में सहयोग मिलता है तो लोगों द्वारा उन्हें बदले में कुछ अर्थ के रूप में सहायता प्रदान किया जाता है। इस प्रकार परस्पर सहयोग से जीवन चलता है। बात साधु की हो तो वह किस रूप में सेवा दे तो वह धर्म का उपदेश देकर, किसी को धार्मिक-आध्यात्मिक त्याग कराकर सहयोग प्रदान करते हैं। 

साधु किसी तपस्वी को दर्शन देने पधार जाए, कभी तपस्या का प्रत्याख्यान, गोचरी, पानी आदि-आदि में समाज को अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं। यह सहयोग व सेवा का कार्य है। मुनि जयघोष गोचरी को गए थे, लेकिन उन्हें गोचरी के लिए मनाही हुई तो उन्होंने लोगों को उपदेश देते हुए कहा कि जिस प्रकार जल में पैदा होने वाला कमल जल से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो कामों से, विषयों से अलिप्त रहने वाला होता है, वह माहण ब्राह्मण कहलाता है। साधु सर्व परिग्रह का त्याग करने वाले होते हैं। साधु को रुपए-पैसे की लेन-देन आदि से दूर ही रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु कोई धार्मिक सेवा भले कर दे, कोई धार्मिक ग्रन्थ पढ़ाना हो, सामायिक के संदर्भ में बताना हो, कोई अध्यात्म के, योग के प्रयोग बताने के साथ राग-द्वेष मुक्ति की साधना हो तो वह करा सकता है, बता सकता है। साधु को पद्म पुष्प की भांति संसार में रहते हुए भी संसार से अलिप्त रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु को सरलता भी रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी कोई दोष लग जाए तो अपने गुरु अथवा अग्रणी के पास सरल भाव से व्यक्त कर प्रायश्चित्त लेने का प्रयास होना चाहिए। अपने साथ किसी भी तरह का दोष नहीं ढ़ोना चाहिए। कब आयुष्य बंध जाए और एक दोष के कारण किस गति में जाना पड़ जाए, इसलिए अपने दोषों का प्रायश्चित्त लेकर स्वयं की आत्मा को निर्मल बनाए रखने का प्रयास होना चाहिए। छदमस्थ है, लेकिन दोष साथ लेकर जाना नहीं, हल्का होकर रहने का प्रयास होना चाहिए। प्रायश्चित्त जो भी जाए, उसे पूर्ण करने का प्रयास होना चाहिए।
साधु ही नहीं, गृहस्थों को भी राग-द्वेष व मारपीट आदि-आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ को अपने जीवन में समय के साथ त्याग-प्रत्याख्यान करना चाहिए। अपनी इच्छाओं का अल्पीकरण करने का प्रयास होना चाहिए। इतनी वस्तुओं से ज्यादा अपने पास नहीं रखने का संकल्प हो। अनावश्यक इच्छाओं से बचने का प्रयास हो। भोग और उपभोग में भी संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु-संतों को दान देने की भावना हो, तो वह भी अच्छी बात हो सकती है। श्रावक के लिए बारह व्रत बताए गए हैं। हालांकि साधु जितना तो नहीं, किन्तु व्रतों के प्रभाव से उसकी आत्मा का भी उत्थान हो सकता है। श्रावक यह विचार करे कि एक से कम एक सामायिक रोज हो जाए। पौषध हो जाए तो यह भी संयम की साधना है। इस प्रकार साधना कर अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास होना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। श्री तरुण सेठिया ने अपना काव्य संकलन ‘अभिवंदन’ को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया तो आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया




