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₹15.15 लाख करोड़ का कथित महाघोटाला? राजेश एक्सपोर्ट्स पर SEBI के गंभीर आरोपों से बाजार, बैंकिंग और ऑडिट व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली। देश की प्रमुख स्वर्ण एवं आभूषण निर्यातक कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स एक ऐसे विवाद के केंद्र में आ गई है जिसने भारतीय शेयर बाजार, ऑडिट व्यवस्था, बैंकिंग निगरानी और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कंपनी पर कई वर्षों तक अपने वित्तीय आंकड़ों को कथित रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया है। जांच में सामने आए आंकड़ों के अनुसार मामला लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के कथित लेन-देन और वित्तीय खुलासों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। यह राशि इतनी बड़ी है कि इसने पूरे वित्तीय जगत को चौंका दिया है।

SEBI के अनुसार कंपनी ने अपनी कुल आय का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों से अर्जित होना दर्शाया, जिनमें स्विट्जरलैंड स्थित Valcambi SA प्रमुख है। जांच के दौरान कंपनी द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और विदेशी इकाइयों के उपलब्ध ऑडिटेड दस्तावेजों में कथित रूप से कई विसंगतियां सामने आईं। नियामक का कहना है कि कंपनी ने कुछ संस्थाओं के साथ हजारों करोड़ रुपये की खरीद और बिक्री दिखाई, जबकि संबंधित पक्षों ने ऐसे कई लेन-देन होने से इनकार किया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो इसका अर्थ होगा कि कारोबार का एक हिस्सा केवल कागजों पर दिखाया गया और उसी आधार पर राजस्व तथा वित्तीय प्रदर्शन को बढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।

मामले का एक और गंभीर पहलू कंपनी के धन के कथित उपयोग से जुड़ा है। SEBI ने आरोप लगाया है कि कंपनी की कुछ राशि प्रमोटर राजेश मेहता से जुड़े निजी खातों तक पहुंची और उसका उपयोग व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग जैसी गतिविधियों में किया गया। कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नियमों के अनुसार कंपनी और प्रमोटर के निजी वित्त पूरी तरह अलग होने चाहिए। ऐसे में यदि कंपनी के धन का निजी उपयोग सिद्ध होता है तो यह शेयरधारकों के हितों के विरुद्ध गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने ऑडिट प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि यदि विदेशी सहायक कंपनियों से इतनी बड़ी आय दिखाई जा रही थी तो उसका स्वतंत्र सत्यापन क्यों नहीं किया गया, कथित खरीद-बिक्री लेन-देन की पुष्टि संबंधित पक्षों से क्यों नहीं ली गई और यदि कंपनी के धन का प्रवाह निजी खातों तक पहुंच रहा था तो उसे समय रहते पकड़ा क्यों नहीं गया। इसी प्रकार बैंकिंग व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है क्योंकि इतने बड़े कारोबार का दावा करने वाली कंपनी को ऋण, क्रेडिट सुविधाएं, बैंक गारंटी और निर्यात वित्त जैसी अनेक सुविधाएं उसके वित्तीय आंकड़ों के आधार पर ही प्रदान की जाती हैं। अब यह जांच का विषय बन गया है कि बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों ने कंपनी के दावों का स्वतंत्र परीक्षण किस स्तर तक किया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में फर्जी बिक्री, गलत इनवॉइस, फंड डायवर्जन या विदेशी लेन-देन में अनियमितताएं सिद्ध होती हैं तो मामला केवल SEBI तक सीमित नहीं रहेगा। आयकर विभाग, GST विभाग, FEMA और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी एजेंसियां भी जांच में शामिल हो सकती हैं। इसके साथ ही यह भी जांचा जा सकता है कि कहीं गलत खर्च दिखाकर कर देनदारी कम करने, धन को विदेश भेजने या निवेशकों को भ्रमित करने का प्रयास तो नहीं किया गया।

यह मामला SEBI की निगरानी प्रणाली पर भी प्रश्न खड़े कर रहा है क्योंकि कंपनी वर्षों से शेयर बाजार में सूचीबद्ध थी और नियमित रूप से ऑडिटेड वित्तीय विवरण जारी करती रही। निवेशकों ने इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर निवेश किया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि कथित अनियमितताएं इतने बड़े पैमाने पर थीं तो उन्हें सामने आने में इतना लंबा समय क्यों लगा। सबसे अधिक प्रभावित छोटे निवेशक हुए हैं, जो कंपनी के आंतरिक रिकॉर्ड नहीं देख सकते और ऑडिट रिपोर्ट, नियामकीय खुलासों तथा शेयर बाजार की पारदर्शिता पर भरोसा करते हैं।

राजेश एक्सपोर्ट्स का यह मामला अब केवल एक कंपनी की कथित वित्तीय गड़बड़ी नहीं बल्कि पूरे कॉर्पोरेट और वित्तीय ढांचे की परीक्षा बन गया है। यदि SEBI के आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो यह पूछा जाएगा कि इतने बड़े वित्तीय आंकड़े वर्षों तक बैलेंसशीट में कैसे बने रहे, ऑडिटर, निदेशक मंडल, बैंक और नियामकीय संस्थाएं उन्हें समय रहते पहचानने में क्यों विफल रहीं। अब पूरे देश की नजर इस बात पर है कि जांच कितनी गहराई तक जाती है और क्या जिम्मेदारी केवल कंपनी और उसके प्रमोटरों तक सीमित रहती है या फिर उन सभी पक्षों तक पहुंचती है जिनकी मंजूरी, निगरानी या चूक के कारण यह कथित मामला इतना बड़ा रूप ले सका।

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