सामाजिक/ धार्मिक

तेरापंथ की राजधानी में तेरापंथाधिशास्ता की सन्निधि में अक्षय तृतीया समारोह का भव्य आयोजन

तप की परिसम्पन्नता के साथ जुड़ा है अक्षय तृतीया: युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं :जैन विश्व भारती, लाडनूं के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सोमवार को अक्षय तृतीया महोत्सव का भव्य आयोजना किया गया। 54 साधु-साध्वियों, सात समणियों सहित इस आयोजन में देश के कोने-कोने से पहुंचे करीब 450 से अधिक श्रद्धालुओं ने अपने वर्षीतप का पारणा किया। श्रद्धालुओं ने आज अपने हाथों से अपने अनुशास्ता के पात्र में ईक्षुरस का दान कर अपने जीवन को धन्य बनाया। इस कारण पूरा जैन विश्व भारती परिसर जनाकीर्ण बना रहा। जन-जन की आंतरिक भावना को स्वीकार करते हुए आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अपने सुगुरु महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में अपने वर्षीतप का पारणा कर श्रद्धालु अत्यंत आह्लादित नजर आ रहे थे।

सोमवार को सुधर्मा सभा वर्षीतप करने वाले श्रद्धालुओं से मानों भरा हुआ था। नित्य आयोजित होने वाले मुख्य प्रवचन कार्यक्रम से पूर्व ही अक्षय तृतीया समारोह का कार्यक्रम प्रारम्भ हो गया। तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता की मंगल सन्निधि में पहली बार अक्षय तृतीया का आयोजन हो रहा था। इसे लेकर लाडनूं के तेरापंथी श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा था। वहीं देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से सेवा करने व वर्षीतप पारणा के संदर्भ में उपस्थित श्रद्धालुओं की अपार संख्या जैन विश्व भारती के विशाल परिसर को भी मानों मेले जैसा रूप प्रदान कर रही थी।

सोमवार को प्रातःकाल से ही जैन विश्व भारती परिसर श्रद्धालुओं की विराट उपस्थिति से जनाकीर्ण नजर आ रहा था। अक्षय तृतीया समारोह के शुभारम्भ होन से पूर्व ही देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित हो चुके थे। आचार्यश्री के आगमन से पूर्व उपस्थित जनता को साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी ने उद्बोधित किया। साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया।                                               

निर्धारित समय पर युगप्रधान आचायश्री महाश्रमणजी मंचासीन हुए तो पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। अक्षय तृतीया समारोह के संदर्भ में तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं सहित लाडनूं तेरापंथ समाज ने गीत का संगान किया। योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री प्रमोद बैद ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को उद्बोधित किया। आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालु जनता को नित्य की भांति कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया।                                               

तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञान से जीव भावों को जानता है। दर्शन के माध्यम से श्रद्धा करता है, चारित्र से निग्रह और तप से विशुद्धि करता है। मोक्ष मार्ग इन चारों का समवाय है। आज अक्षय तृतीया समारोह एक तप की परिसम्पन्नता के साथ जुड़ा हुआ है। आज के ही दिन जैन शासन के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के तप की सम्पन्नता हुई थी। वे इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हुए। धर्म की दृष्टि से तीर्थंकर का पद सर्वोच्च होता है। भौतिक दुनिया में चक्रवर्ती भी सबसे बड़े होते हैं। भगवान ऋषभ दोनों ही बने। भगवान ऋषभ को राजनीति और धर्मनीति के व्यवस्था में अग्रणी मान सकते हैं। उनका दोनों क्षेत्र में अवदान है। वे एक महान धर्मनेता भी कहे जा सकते हैं। आज का दिन उनकी तपस्या की सम्पन्नता से जुड़ा हुआ है। उन्होंने दीक्षा से पूर्व कितना शिक्षण, प्रशिक्षण लोगों को प्रदान किया। भगवान ऋषभ ने मानों अपने कर्त्तव्य का निर्वाह किया। बारह महीना और चालीस दिन का उनका वर्षीतप हुआ। वर्तमान में तो लोग सलक्ष्य वर्षीतप करते हैं, लेकिन भगवान ऋषभ का वर्षीतप तो स्वतः ही बिना लक्ष्य के हो गया। उनको मानों दान मिला ही नहीं तो उनके तो सहज ही तप हो गया। एक दिन उपवास और एक दिन भोजन की व्यवस्था भी बहुत अच्छी है। हमारे साधु-साध्वियां विहार आदि करने के बाद भी वर्षीतप करते हैं।

आचार्यश्री ने नए वर्षीतप करने वाले श्रावक-श्राविकाओं को उससे संदर्भित संकल्प कराया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने भगवान ऋषभ के नाम मंत्रों का जप भी कराया। आचार्यश्री ने आज के दिन एक और दीक्षा की घोषणा करते हुए कहा कि विकास महोत्सव अर्थात् 20 सितम्बर 2026 को मुमुक्षु कोमल को साध्वी दीक्षा देने का भाव है।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री के पात्र में ईक्षुरस दान करने की प्रक्रिया जो कई देर तक चलता रहा। अपने आराध्य के सुपात्र में ईक्षुरस का दान कर वर्षीतप का पारणा करने वाले साधु-साध्वियां, समणियों सहित श्रावक-श्राविकाओं ने आह्लाद का अनुभव किया। इस प्रकार कुल मिलाकर 450 से अधिक लोगों ने ईक्षुरस का दान देकर अपने वर्षीतप का पारणा किया। आचार्यश्री ने मंत्री मुनिश्री सुमेरमलजी स्वामी (लाडनूं) के प्रयाण दिवस पर उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण के प्रति मंगलकामना की।

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