मध्यमवर्गीय परिवारों पर शिक्षा का बढ़ता बोझ, बच्चों को पढ़ाना हुआ महंगा
हर साल बढ़ती फीस, महंगी किताबें, ड्रेस और ट्रांसपोर्ट शुल्क से अभिभावकों की बढ़ी चिंता, सरकार से नियंत्रण की मांग

सूरत। देश में लगातार बढ़ती महंगाई के बीच अब शिक्षा भी मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। हर वर्ष निजी स्कूलों की फीस में बढ़ोतरी के साथ-साथ किताबों, ड्रेस, जूते-मोजे, स्कूल बैग और ट्रांसपोर्ट शुल्क में वृद्धि ने अभिभावकों के बजट को प्रभावित कर दिया है। स्थिति यह है कि एक बच्चे की सालाना पढ़ाई पर 40 से 60 हजार रुपये तक खर्च हो रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।
अभिभावकों का कहना है कि स्कूलों द्वारा किताबें और यूनिफॉर्म निर्धारित दुकानों या सीधे स्कूल से ही खरीदने की बाध्यता के कारण खर्च और बढ़ जाता है। कई स्कूलों में किताबों की कीमत 3 हजार से 8 हजार रुपये तक पहुंच गई है, जबकि क्लास 1 से 7 तक की फीस 20 हजार से 85 हजार रुपये तक ली जा रही है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट शुल्क में भी हर साल वृद्धि हो रही है, जिससे दूर-दराज से आने वाले छात्रों के अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
अभिभावकों ने बच्चों के बढ़ते बस्ते के वजन को लेकर भी चिंता जताई है। छोटे बच्चों के बैग का वजन 5 से 7 किलो तक पहुंच रहा है, जो उनके शारीरिक विकास पर नकारात्मक असर डाल रहा है। वहीं भारी फीस देने के बावजूद स्कूलों में विभिन्न एक्टिविटी, कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों के नाम पर अलग-अलग शुल्क भी लिया जाता है।

अभिभावक नारायण शर्मा ने कहा कि शिक्षा का मंदिर अब व्यापार बनता जा रहा है। बढ़ती फीस, महंगी किताबें और निर्धारित दुकानों से सामान खरीदने की बाध्यता के कारण मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों को पढ़ाना कठिन होता जा रहा है। सरकार को स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगानी चाहिए।

गृहणी रीता शर्मा का कहना है कि एक ओर महंगाई की मार है और दूसरी ओर स्कूलों की बढ़ती फीस ने परिवार का बजट बिगाड़ दिया है। हर अभिभावक अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, लेकिन लगातार बढ़ते खर्च के कारण सपनों पर असर पड़ रहा है।

कॉलेज छात्र अजय माहेश्वरी ने कहा कि फीस, किताबें, ड्रेस और ट्रांसपोर्ट के बढ़ते खर्च के कारण शिक्षा एक आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। सरकार को शिक्षा को किफायती बनाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

व्यापारी मुकेशकुमार डागा ने कहा कि फीस के अलावा एक्टिविटी चार्ज, ट्यूशन और अन्य खर्च मिलाकर अभिभावकों पर काफी आर्थिक दबाव पड़ रहा है। छोटे बच्चों के भारी बैग भी चिंता का विषय हैं।

गृहणी ज्योति कुमारी ने बताया कि देश में हजारों निजी स्कूल हर वर्ष 2 से 10 प्रतिशत तक फीस बढ़ा रहे हैं, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। सरकार को शिक्षा के खर्च पर नियंत्रण के लिए सख्त नियम बनाने चाहिए।

एजुकेटर करिश्मा माखीजा ने कहा कि फीस वृद्धि, किताबों में बदलाव और अतिरिक्त शुल्क के कारण अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
अभिभावकों ने सरकार से मांग की है कि स्कूल फीस, किताबों की कीमत, यूनिफॉर्म और ट्रांसपोर्ट शुल्क पर नियंत्रण के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं, ताकि शिक्षा सभी के लिए सुलभ और किफायती बन सके तथा बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सके।



