समता का मनोबल द्वारा झेले विपरीत परिस्थिति को : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण
- 53 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान कर मुनि श्री पारस से रचा इतिहास- योगक्षेम प्रवचनमाला के अंतर्गत पूज्यप्रवर द्वारा परिषह विजय की प्रेरणा

28.03.2026, शनिवार, लाडनूं:लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास गतिमान है। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता और अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने विशाल सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रेरणा दी। मंगल महामंत्रोच्चार के साथ मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। साध्वी वृंद ने गीत का संगान किया।
आज के समारोह में मुनि पारस कुमार जी ने पूज्य गुरुदेव से 53 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। यह अपने आप में एक अद्भुत कीर्तिमान है कि इसी के साथ वर्तमान समय में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ में 53 दिन की तपस्या की लड़ी संपन्न करने वाले आप प्रथम मुनिश्री है। इसके अतिरिक्त 18 मासखमण, 62 दिन की तपस्या सहित अनेकों दीर्घ तपस्याएं मुनिश्री द्वारा संपन्न हो चुकी है।

आचार्य प्रवर के उद्बोधन पश्चात साध्वी प्रेमलता जी, साध्वी समन्वय प्रभा जी आदि साध्वियों द्वारा गीत की प्रस्तुति दी गई।मुख्य प्रवचन में आचार्यश्री महाश्रमण ने परीषह के मर्म को समझाते हुए फरमाया कि जैन साधु-साध्वियों के जीवन में क्षुधा, प्यास, शीत, ग्रीष्म जैसे 22 प्रकार के परीषह आ सकते हैं। संयम मार्ग से विचलित न होने और कर्मों की निर्जरा के लिए इन कष्टों को समता और सहिष्णुता के साथ सहन करना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि कभी भूख या प्यास सताए, या वर्षा-सर्दी जैसी प्राकृतिक प्रतिकूलताएं आ जाएं, तो भी मन में समता भाव रहना चाहिए। जिनकल्पिक साधुओं के उत्कृष्ट मनोबल और नारकीय जीवों के असहनीय दुखों का चिंतन करते हुए कष्टों को अहोभाव से सहन करना चाहिए। व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन में सामंजस्य की प्रेरणा देते हुए आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि जीवन में केवल शारीरिक स्वस्थता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि चित्त की प्रसन्नता और अटूट मनोबल भी अनिवार्य है। जब तक भय की स्थिति न आए, तब तक भले ही व्यक्ति सतर्क रहे, परंतु जब परिस्थिति सामने आ ही जाए, तो बिना समता के साथ उसका सामना करना चाहिए। चाहे वह कोई निंदा या अपमान का प्रसंग हो उस समय वाणी से नहीं, बल्कि अपने श्रेष्ठ कार्यों से उसका उत्तर देना चाहिए।
गुरुदेव ने कहा कि गृहस्थों के जीवन में भी आर्थिक, पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आ सकती हैं, किंतु आर्तध्यान, दुख का विलाप करने के बजाय उन्हें भी जप, तप, स्वाध्याय से ऐसी परिस्थितियों को समतापूर्वक झेलना चाहिए। सभी मनोबल को इतना पुष्ट बनाएं कि कभी संयम के मार्ग से स्खलित न हों और परीषह विजेता बनकर आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ते रहें।



