
22.03.2026, रविवार, लाडनूं:तेरापंथ की राजधानी लाडनूं तेरापंथ अनुशास्ता के पावन सान्निध्य से कृतार्थ हो रही है। योगक्षेम वर्ष प्रवास के अंतर्गत विविध प्रशिक्षण, शिक्षण, कक्षाएं, गतिविधियों, सेमिनार आदि से साधु साध्वियों के साथ सकल समाज अध्यात्म गंगा से ओतप्रोत हो रहा है। जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में गुरूदेव की सेवा उपासना हेतु देश विदेश से सैकड़ों श्रद्धालुओं का आवागमन भी निरंतर जारी है। जैन विश्व भारती विश्व विद्यालय, आचार्य तुलसी स्मारक, साहित्य सदनम, सेवाभावी आयुर्वेदिक रसायनशाला जैसे अनेकों आयाम जनता के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए है।

सुधर्मा सभा में प्रवचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जैन शासन में तीर्थंकर सर्वोच्च हैं और उनके बाद आचार्य का पद ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। गुरु और शिष्य के संबंधों की गहरी व्याख्या करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आगे फरमाया कि हमारे धर्मसंघ में आचार्य का पद ही सर्वोपरि है और सभी सातों पदों का कार्यभार आचार्य में ही समाहित होता है। यदि कभी आचार्य शिष्य से अप्रसन्न हो जाएं, तो शिष्य को तो शिष्य को अपनी त्रुटि का बोध कर लेना चाहिए। यदि शिष्य को लगे कि गुरु उससे नाराज हैं, तो उसका परम कर्तव्य है कि वह नम्रतापूर्वक उनके कोप को शांत कर उन्हें शीघ्र प्रसन्न करे। आगमकार बताते हैं कि शिष्य हाथ जोड़कर वंदना की मुद्रा में बैठे और प्रीति-कारक वचनों से गुरु को यह विश्वास दिलाए कि उससे जो भी भूल हुई है, वह भविष्य में दोबारा नहीं होगी। शिष्य के मन में अहंकार नहीं अपितु विनम्रता का भाव होना चाहिए। गुरू के समक्ष शिष्य बालक के समान होता है। जो शिष्य गुरु की डांट और उपालंभ को बिना किसी आवेश या गुस्से के अत्यंत गंभीरता और विनय से झेलते हैं, ऐसे विनीत, सेवाभावी और सरल शिष्य वास्तव में शासन के गौरव समान महान होते हैं। गुरु तो सर्वोच्च और महान हैं ही, लेकिन गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य कर समर्पित रहने वाले ऐसे महान शिष्यों को भी मैं प्रणाम करना चाहता हूँ।



