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मंगलमय हो योगक्षेम वर्ष : महातपस्वी महाश्रमण

भव्य एवं आध्यात्मिक रूप में प्रारम्भ हुआ योगक्षेम वर्ष

🌸🌸🌸शिक्षण, प्रशिक्षण, चिंतन, मंथन व निर्णय के लिए योगक्षेम वर्ष को आचार्यश्री ने बताया उपयुक्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत को दी प्रस्तुति, मुमुक्षु बहनों ने भी किया गीत का संगान तत्त्वज्ञान व प्रेक्षाध्यान के विद्यार्थियों को आचार्यश्री ने दी मंगल प्रेरणा जैन विश्व भारती परिसर में अनेक भवनों का हुआ लोकार्पण आठ बातें ज्ञान की पुस्तक भी श्रीचरणों में हुई लोकार्पित लाडनूं, डीडवाना-कुचामन राजस्थानवर्षों की प्रतीक्षा व त्रिदिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान जब पूर्णतया फलित हुआ तो फाल्गुन शुक्ला द्वितीया तदनुसार 19 फरवरी 2026 को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणी के जन्मदिवस के दिन जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ की प्रभावना को प्रसारित करने वाले योगक्षेम वर्ष का मंगल शुभारम्भ हो गया। इस शुभारम्भ के अवसर पर जैन विश्व भारती में विभिन्न आध्यात्मिक-धार्मिक व सामाजिक गतिविधियों के कुशल संचालन के लिए अर्जवम् भवन, मैत्री सदन, अणुव्रत भवन व बोधिगृहम् का लोकार्पण युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगलपाठ के साथ प्रारम्भ हुआ। इतना ही नहीं योगक्षेम वर्ष के प्रारम्भ के दिन ही मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक ‘आठ बातें ज्ञान की’ भी जैन विश्व भारती द्वारा पूज्यचरणों में लोकार्पित की गई। इस प्रकार संघ प्रभावक योगक्षेम वर्ष का भव्य एवं आध्यात्मिक मंगल शुभारम्भ हो गया।

गुरुवार को जैन विश्व भारती परिसर में मानों गुरुवार को एक अलग ही वातावरण छाया हुआ नजर आ रहा था। तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणी का जन्मदिवस का अवसर भी था और करीब 37 वर्षों के बाद योगक्षेम वर्ष के शुभारम्भ का भी सुअवसर था तो श्रावकों की भी विशेष उपस्थिति नजर आ रही थी। आचार्यश्री मंगल प्रवचन में पधारने से पूर्व जैन विश्व भारती परिसर में धार्मिक-आध्यात्मिक, सामाजिक व संगठनात्मक कार्यों के उद्देश्य से बने चार नवीन भवन- आर्जवम्, मैत्री सदन, अणुव्रत भवन व बोधिगृहम में पधारे और मंगलपाठ का उच्चारण करते हुए मंगल आशीर्वाद प्रदान किया तो संबंधित लोगों व उनके परिजनों द्वारा भवनों का लोकार्पण किया गया गया।

मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी सुधर्मा सभा में पधारे तो पूरा वातावरण जयघोष से गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया।

तत्पश्चात महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को योगक्षेम वर्ष के मंगल शुभारम्भ के अवसर पर महामंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि योगक्षेम वर्ष 2026-27 के शुरु हो चुके की घोषणा करता हूं। आगम में योगक्षेम शब्द आया है। योगक्षेम वर्ष का नाम योग और क्षेम दो शब्दों का जुड़ाव है। आगम में यह शब्द प्राप्त होता है तो यह मानना चाहिए कि आगमिक आधार पर योगक्षेम वर्ष का नामकरण किया गया है। भगवान ऋषभ व भगवान महावीर से जुड़ी यह जैन शासन है, जिसमें दिगम्बर व श्वेताम्बर नाम की दो धाराएं बह रही हैं। श्वेताम्बर धारा में एक आम्नाय तेरापंथ है, जिसके प्रवर्तक आद्य अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु स्वामी हुए। उनकी परंपरा में उत्तराधिकारियों की परंपरा आगे बढ़ी। उसमें तेरापंथ के अष्टमाचार्य परम पूजनीय आचार्यश्री कालूगणी हुए। उनके समय में धर्मसंघ में विकास भी हुआ। उनके द्वारा दीक्षित दो सुशिष्य मुनि तुलसी व मुनि नथमलजी (टमकोर) हमें आचार्य के रूप में प्राप्त हुए। कालूगणी के अनंतर उत्तराधिकारी पूज्य आचार्यश्री तुलसी व उसके बाद परम स्तवनीय आचार्यश्री महाप्रज्ञजी हुए। ये दोनों ही पूज्यप्रवर युगप्रधान की गरिमा से मंडित हुए थे। ये दो आचार्य ऐसे हुए हैं, जिनको हम में से कइयों ने प्रत्यक्ष देखा भी हुआ है, उन्हें नमन भी किया गया है।
आचार्यश्री तुलसी के समय योगक्षेम वर्ष आयोजित हुआ था और लगभग वहीं प्रांगण आज भी हमें प्राप्त है, जहां योगक्षेम वर्ष के प्रारम्भ की पुनरावृत्ति हुई है। महाश्रमणी साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी ने आचार्यश्री तुलसी के समय भी योगक्षेम वर्ष का निवेदन रखा था और उन्होंने ही मेरे सामने भी इसका निवेदन रखा था। उनके कथन को स्वीकार कर योगक्षेम वर्ष की घोषणा की, वह घोषणा आज प्रारम्भ हो रहा है। जिन्होंने निवेदन किया था वे तो अब सदेह नहीं हैं, परन्तु उस निवेदन के संदर्भ में साध्वीप्रमुखा अब विश्रुतविभाजी को मान लेता हूं।

हमारे धर्मसंघ के लिए योगक्षेम वर्ष मंगलमय हो। इस दौरान यदि हम अहिंसा, संयम की साधना करते हैं और तप तपते हैं तो यह योगक्षेम वर्ष मंगलमय हो ही जाएगा। तीन दिनों का अनुष्ठान मानों योगक्षेम वर्ष का शिलान्यास था। अब योगक्षेम वर्ष की कालावधि शुरु हो गई है। यह हमारे विकास में सहायक बने। इस दौरान अनेक रूपों में प्रशिक्षण का कार्य चलता रहे। चिंतन, मंथन, निर्णय के लिए भी यह वर्ष महत्त्वपूर्ण है। धर्मसंघ की साधना कैसे पुष्ट हो, इसका प्रयास होना चाहिए। आचार, विचार पक्ष कैसे मजबूत हो। इस प्रकार शिक्षण-प्रशिक्षण व चिंतन-मंथन के द्वारा योगक्षेम वर्ष को अच्छा बनाने का प्रयास किया जा सकता है। इस योगक्षेम वर्ष की कालावधि तक यदि ज्ञानात्मक दृष्टि व जानकारी के दृष्टि से बहिर्विहार में रहने वाले साधु-साध्वियां भी यदि ठिकाणे में सहज रूप में यूट्यूब आदि के माध्यम से टीवी में प्रसारण हो रहा हो तो देख सकते हैं, इसके लिए अनापत्ति है। इस दौरान चलने वाले शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद परीक्षा भी होने के बाद ही कोई डिग्री या उपाधि प्रदान की जाए। हमारे अष्टम आचार्यश्री कालूगणी का जन्मदिवस है। आज का दिन अणुव्रत, पारमार्थिक शिक्षण संस्था से जुड़ा हुआ है। यह वर्ष धर्मसंघ को ऊंचाई प्रदान करने वाला सिद्ध हो।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने उपस्थित चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को भी प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने पहले तत्त्वज्ञान के क्लास के विद्यार्थियों को मंगल प्रेरणा प्रदान की। इसी प्रकार प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को भी मंगल पाथेय प्रदान किए। तदुपरान्त आचार्यश्री के ठाणं प्रवचन के आधार पर जैन विश्व भारती के द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘आठ बातें ज्ञान की’ को जैन विश्व भारती आदि के पदाधिकारियों ने आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित की। तदुपरान्त मुमुक्षु बहनों ने गीत का संगान किया। श्री राकेशमणिजी ने संस्कृत भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ समाज-छापर ने अपनी गीत को प्रस्तुति दी

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