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श्रवण शक्ति का करें सदुपयोग : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

त्रिदिवसीय अनुष्ठान के अंतिम दिन आचार्यश्री ने दी अच्छे श्रोता बनने की प्रेरणा

लगभग चालीस मिनट तक चला अनुष्ठान के मंत्रों का जप-गुरुवार से हो रहा है योगक्षेम वर्ष का मंगल शुभारम्भ

18.02.2026, बुधवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) ।जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य सुधर्मा सभा में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में त्रिदिवसीय अनुष्ठान का बुधवार को अंतिम दिवस था। बुधवार को भी सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आध्यात्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत विभिन्न मंत्रों का जप कराया। लगभग चालीस मिनट चले जप ने मानों पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से आप्लावित कर दिया।

मुनि कुमारश्रमणजी ने प्रेक्षाध्यान के समय आदि की जानकारी प्रदान की। मुनि योगेशकुमारजी ने तत्त्वज्ञान के क्लास के विषय में जानकारी दी। साध्वी कनकश्रीजी ने जैन तत्त्व दर्शन के साध्वी व समणियों के प्रशिक्षण के संदर्भ में जानकारी दी।

तदुपरान्त उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि योगक्षेम वर्ष का पृष्ठभूमि रूप त्रिदिवसीय अनुष्ठान का उपक्रम चल रहा है। आज तीसरा दिन है। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत सुनना भी एक अच्छा कार्य है। प्रशिक्षण देने वाले क्लास लेते हैं, उनकी बात सुनो, प्रवचन सुनो और कोई भी प्रेरणा की बात सुनी जा सकती है। इस प्रकार श्रुति भी योगक्षेम वर्ष का मानों विशेष कार्य है। श्रोत्रेन्द्रिय का बहुत महत्त्व है। जो प्राणी सुनने वाला होता है, वहीं जीव पंचेन्द्रिय प्राणी होता है। सुनने की क्षमता हम सभी को प्राप्त है। सुनने से अनेक जानकारियां मिल सकती हैं। प्रवचन के दौरान आगमवाणी, आर्षवाणी का श्रवण करने से तो मानों कान धन्य हो जाते हैं। सुनने से कितना ज्ञानार्जन हो सकता है। सुनने से कई बार समस्याओं का समाधान भी हो सकता है। यदि वह चारित्रात्मा के मुख से आगमवाणी के श्रवण का अवसर मिले तो वह और भी सौभाग्य की बात हो जाती है। कई बार कोई गृहस्थ भी बहुश्रुत व्यक्ति हो सकते हैं। बहुश्रुत होने के साथ-साथ उनकी अच्छी प्रस्तुति करने की कला भी अच्छी हो जाए तो उसके साथ अच्छी उपलब्धि जुड़ जाती है। कई ऐसे भी होते हैं, ज्ञान तो बहुत होता है, किन्तु उनकी प्रस्तुति उस ढंग से नहीं हो पाती।

व्याख्यान देने अथवा प्रस्तुति करने की तरीके ही जानकारी भी ली जा सकती है। हमारे पूर्वाचार्यों की वाणियों से प्रेरणा ली जा सकती है। बोलने से पहले शांति से सुनने का प्रयास करना चाहिए। कान दो हैं और मुख एक है। इसलिए आदमी को सुनना ज्यादा और कम से कम बोलने का प्रयास होना चाहिए। जहां तक संभव हो आदमी को सारगर्भित बोलने का प्रयास करना चाहिए।

सुनकर आदमी पाप को भी जान लेता है और कल्याण को भी जान लेता है। उसमें जो भी श्रेयस्कर हो, उसका समाचरण करने का प्रयास करना चाहिए। किसी दुःखी आदमी के दुःख को भी धैर्य से सुन लिया जाए। यदि कोई उसका समाधान दे पाऐं अथवा नहीं, उसके तकलीफों को सुन भी लें तो उसे कुछ शांति की प्राप्ति हो सकती है। सुनने से कितनी-कितनी प्रेरणा मिल सकती है। आचार्यश्री तुलसी अपने व्याख्यान के दौरान गीत भी सुनने को मिलता था। उन्होंने कितना-कितना ज्ञान प्रदान किया था। जहां भी ज्ञान की बातें हों और अच्छी जानकारी उसे ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। शुद्ध भाषा सुनने को मिले तो और अच्छी बात हो सकती है। कहां कैसे बोलना, व्याकरण का उच्चारण भी अच्छा होता है तो सुनने वाले को और अच्छा ज्ञान प्राप्त हो सकता है। साध्वीवर्याजी ने तत्त्वज्ञान के संदर्भ में कुछ जानकारी प्रदान की। आचार्यश्री ने योगक्षेम वर्ष में चलने वाले नियमित कार्यक्रम से संबंधित कुछ नियमों आदि के जानकारी दी। आचार्यश्री ने कल से तत्त्वज्ञान व प्रेक्षाध्यान की कक्षा कल से ही प्रारम्भ करने प्रेरणा प्रदान की।

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