श्रीराम वनवास प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
सीता विदाई और वनगमन की मार्मिक कथा ने नम कर दीं आंखें, धर्म और कर्तव्य का दिया संदेश

सूरत। वेसु स्थित कैपिटल ग्रीन सोसाइटी बैंक्वेट हॉल में आयोजित श्रीराम कथा महोत्सव के तीसरे दिन सोमवार को सीता विदाई एवं श्रीराम वनवास गमन का अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग सुनाया गया। कथा के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के वनगमन की मार्मिक व्याख्या सुनकर पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और अनेक भक्तों की आंखें नम हो गईं।
व्यास पीठ से संत अलका श्रीजी ने भगवान श्रीराम की लीलाओं का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि सीता स्वयंवर के उपरांत भगवान श्रीराम और माता सीता सहित चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ। जनकपुर से बारात के अयोध्या पहुंचने पर पूरे नगर में उत्सव का वातावरण था, लेकिन माता कैकेयी द्वारा राजा दशरथ से दो वरदान मांगने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। परिणामस्वरूप भरत को राजगद्दी और भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला।
संत अलका श्रीजी ने कहा कि पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए भगवान श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक वनवास स्वीकार किया। माता सीता ने पत्नीत्व धर्म का पालन करते हुए वनगमन का संकल्प लिया, वहीं लक्ष्मण ने भ्रातृ प्रेम और सेवा भाव का परिचय देते हुए उनके साथ वन जाने का निर्णय किया। तीनों के अयोध्या से प्रस्थान करते ही पूरी नगरी शोक में डूब गई।
कथा के दौरान संत अलका श्रीजी ने बताया कि सीता विदाई का प्रसंग त्याग, संस्कार और परिवार के प्रति समर्पण का संदेश देता है, जबकि श्रीराम का वनवास धर्म, कर्तव्य और वचन पालन की सर्वोच्च मिसाल है। भगवान राम ने सत्य और धर्म की स्थापना का आदर्श प्रस्तुत किया, माता सीता ने समर्पण और त्याग का, जबकि लक्ष्मण ने भाई के प्रति अटूट प्रेम और सेवा का अनुपम उदाहरण दिया।
इस अवसर पर श्रीराम कथा महोत्सव के मनोरथी कौशल्या देवी गिलड़ा, वासुदेव गिलड़ा, सर्वेश्वर गिलड़ा, गीता देवी अग्रवाल, आशीष अग्रवाल, सचिन अग्रवाल, नितिन अग्रवाल सहित अतिथि अनिल मंधना, रामप्रसाद झावर, रश्मि साबू, भगवतीजी, अजय बिरोलिलिया, मनोज गोयल तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।




