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श्रीमद्भागवत कथा में शिव विवाह से रानी सती अवतार तक के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन

भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री ने सत्संग, माता-पिता की सेवा और भगवत स्मरण का बताया महत्व

सूरत। श्री शक्ति धाम सेवा समिति द्वारा श्री राणी सती दादी मंदिर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में सिटी लाइट स्थित महाराजा अग्रसेन पैलेस के पंचवटी हॉल में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन श्रद्धा और भक्ति का अनुपम वातावरण देखने को मिला। कथा का आयोजन 9 से 15 जून तक प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक किया जा रहा है।

कार्यक्रम के मुख्य यजमान परिवार ने व्यासपीठ का पूजन एवं आरती की, जबकि समिति पदाधिकारियों ने भागवताचार्य राधेश्याम शास्त्री का सम्मान कर आशीर्वाद प्राप्त किया। व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए शास्त्रीजी ने शिव विवाह, सुखदेव आगमन, भीष्म पितामह, राजा परीक्षित, भगवान के 24 अवतार तथा गोपी-उद्धव संवाद सहित विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण पितरों की कृपा और ठाकुरजी के आशीर्वाद से ही संभव होता है। कथा, कीर्तन और भगवत स्मरण से ही जीवन का वास्तविक कल्याण होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सौ कार्य छोड़कर भजन, हजार कार्य छोड़कर स्नान, लाख कार्य छोड़कर दान तथा करोड़ों कार्य छोड़कर भगवान का स्मरण करना चाहिए।

कथा के दौरान प्रस्तुत भजनों ‘बिनु सत्संग विवेक न होई’, ‘अंखियां हरि दर्शन को प्यासी’ तथा ‘इतना तो कर देना स्वामी’ ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। रानी सती प्रसंग का वर्णन करते हुए शास्त्रीजी ने बताया कि भगवान के आशीर्वाद से उत्तरा को कलियुग में नारायणी रूप में जन्म लेकर रानी सती के रूप में प्रतिष्ठित होने का वरदान प्राप्त हुआ।

वर्तमान सामाजिक परिवेश पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने माता-पिता की सेवा को चारों धाम की यात्रा से भी श्रेष्ठ बताया। उन्होंने कहा कि माता-पिता का सम्मान और सेवा ही सच्ची तीर्थयात्रा है। साथ ही दान और सेवा को अहंकार रहित भाव से करने की प्रेरणा देते हुए बेटियों के महत्व पर प्रकाश डाला। आयोजन समिति के अनुसार गुरुवार को कथा में ध्रुव चरित्र प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया जाएगा।

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