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सूरत में मानव तस्करी और बाल मजदूरी नेटवर्क का भंडाफोड़,91 नाबालिंग बच्चो को छुड़ाया

तीन टेक्सटाइल यूनिटों पर राजस्थान पुलिस व पूणा पुलिस की संयुक्त कार्यवाही

सूरत। शहर में मानव तस्करी और बाल मजदूरी के संगठित नेटवर्क का बड़ा खुलासा सामने आया है। संयुक्त एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई में तीन अलग-अलग टेक्सटाइल यूनिटों पर छापेमारी कर कुल 91 नाबालिग बच्चों को मुक्त कराया गया। बचाए गए बच्चों में मात्र सात वर्ष की आयु का बच्चा भी शामिल होने से जांच एजेंसियां भी हैरान रह गईं। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि बच्चों से प्रतिदिन 12 घंटे से अधिक समय तक मजदूरी कराई जा रही थी।

सूचना के आधार पर चला संयुक्त ऑपरेशन

यह कार्रवाई गायत्री सेवा संस्थान द्वारा दी गई पुख्ता सूचना के आधार पर की गई। ऑपरेशन में National Commission for Protection of Child Rights (एनसीपीसीआर), एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, राजस्थान पुलिस के 22 अधिकारी, पुणा पुलिस स्टेशन की टीम, एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन तथा गायत्री सेवा संस्थान के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से भाग लिया। सभी संस्थाएं  जस्ट राइट्स ऑफ चिल्ड्रन नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं।

राजस्थान, यूपी, बिहार और झारखंड से लाए गए बच्चे

अधिकारियों के अनुसार मुक्त कराए गए बच्चों की उम्र 7 से 14 वर्ष के बीच है। अधिकांश बच्चों को राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों से मानव तस्करी के माध्यम से सूरत लाया गया था। उदयपुर जिले से लाए गए दो सगे भाइयों सहित कई बच्चों को गांवों से बहला-फुसलाकर लाया गया था। इसके अलावा तीन बच्चे उत्तर प्रदेश से तथा एक-एक बच्चा बिहार और झारखंड से लाए जाने की जानकारी सामने आई है।

घुमाने के बहाने लाकर कराया जाता था काम

बचाए गए बच्चों ने बताया कि उनके माता-पिता को मजदूरी के लिए भेजे जाने की जानकारी थी, लेकिन छोटे बच्चों को घूमाने या शहर दिखाने के बहाने सूरत लाया गया। कुछ बच्चे पिछले तीन-चार वर्षों से यूनिटों में काम कर रहे थे, जबकि कुछ हाल ही में लाए गए थे।

बाहर से ताला लगाकर कराया जाता था श्रम

जांच में सामने आया कि बच्चों को बेहद खराब और भीड़भाड़ वाली बस्तियों में रखा जाता था। एक कमरे में 12 से 15 बच्चों को साथ रहना पड़ता था। कई इमारतों को बाहर से ताला लगाकर सुबह बच्चों को अंदर बंद कर दिया जाता और शाम सात बजे के बाद ही बाहर निकाला जाता था।

गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेन्द्र पंड्या के अनुसार छापेमारी के दौरान 7-8 वर्ष के बच्चे भी मशीनों पर काम करते मिले। बच्चे डरे हुए और अत्यधिक थके दिखाई दिए। एक बच्चा बिना शर्ट के मिला जो अन्य बच्चों के पीछे छिपकर पहनने के लिए कपड़े मांग रहा था।

मानव तस्करी और बाल मजदूरी संगठित अपराध : विशेषज्ञ

रवि कांत, राष्ट्रीय संयोजक, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन नेटवर्क ने कहा कि यह मामला दर्शाता है कि मानव तस्करी और बाल मजदूरी राज्यों के बीच फैला संगठित आपराधिक नेटवर्क है। आर्थिक रूप से कमजोर एवं आदिवासी परिवारों के बच्चों को झूठे वादों से फंसाकर शोषण की परिस्थितियों में धकेला जा रहा है। उन्होंने अंतरराज्यीय समन्वय मजबूत करने और तस्करों व यूनिट संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता बताई।

फरार संचालकों की तलाश, बच्चों को किया जाएगा पुनर्वास

छापेमारी के दौरान यूनिट संचालक और तस्करी से जुड़े लोग मौके से फरार हो गए, जिनकी तलाश जारी है। मुक्त कराए गए सभी बच्चों को आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष प्रस्तुत कर पुनर्वास की कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

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