सम्यक् ज्ञान, दर्शन व चारित्र की आराधना में सहयोगी बनती है भाषा : महातपस्वी महाश्रमण
आचार्यश्री ने ‘भाषाओं का ज्ञान किसलिए?’ विषय को किया विवेचित

-चारित्रात्माओं की परीक्षाओं व परीक्षकों के संदर्भ में भी आचार्यश्री ने दी जानकारी
-शांतिदूत के जन्मोत्सव, पट्टोत्सव से संदर्भित प्रस्तुतियों का दौर रहा जारी
02.05.2026, शनिवार, लाडनूं :जन-जन के मानस का आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में जैन विश्व भारती-लाडनूं में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। नित्य प्रति श्रद्धालुओं का उमड़ता सैलाब मानों इस सौभाग्य का सम्पूर्ण लाभ उठाने को आतुर दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं, तेरापंथ समाज की विभिन्न केन्द्रीय संगठन व संस्थाओं के द्वारा भी इस सुअवसर का लाभ उठाने की दृष्टि से विभिन्न संगोष्ठियां, सम्मेलन, कार्यशाला आदि भी आयोजित हो रहे हैं, जिसमें सैंकड़ों-सैंकड़ों की संख्या में लोग उपस्थित होकर इस सौभाग्य का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। आचार्यश्री की मंगलवाणी से नित्य प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा सबसे मानस को आप्लावित कर रही है। इतना ही नहीं, प्रतिदिन आचार्यश्री द्वारा कराया जाने वाला ध्यान का प्रयोग भी लोगों के चंचल व विचलित चित्त को सुस्थिर बनाने वाला बन रहा है।

शनिवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘भाषाओं का ज्ञान किसलिए?’ को विवेचित करते हुए कहा कि जीवन में भाषा एक बहुत बड़ा माध्यम है। आदमी अध्ययन करे या अध्यापन करे, इसमें दो चीजें होती हैं- पहला है विषय और दूसरा है भाषा। अध्यात्म विद्या हो, भूगोल, खगोल, गणित, सामाजिक विज्ञान है, विज्ञान है और भी कई चिकित्सा, वकालत आदि से संबंधित विषय होते हैं तो इन सभी विषयों का ज्ञान कराने का माध्यम भाषा बनती है। इसी प्रकार कोई विद्यार्थी हिन्दी माध्यम से पढ़ाई करता है तो कोई अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करता है तो कोई-कोई प्रान्तीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ने का प्रयास किया जाता है।

भाषा हमेशा एक माध्यम बनती है। विषयों को जानने के लिए भाषाओं का ज्ञान आवश्यक होता है। संस्कृत भाषा के ग्रन्थ को पढ़ने और पढ़ाने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान होना ही चाहिए। अगर भाषा का ज्ञान होता है तो आदमी किसी भी विषय का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार विषय को जानने के लिए, दूसरों की विचाराभिव्यक्ति को समझने और अपनी विचाराभिव्यक्ति करने के लिए भाषा का ज्ञान अपेक्षित हो सकता है। जिस भाषा का प्रयोग नहीं होता, वह भाषा आदमी के लिए अपरिचित-सी हो जाती है। आदमी को अपनी मातृभाषा में बोलना, पढ़ना, समझना कितना आसान हो जाता है। बाद में सीखी हुई भाषा बिना अभ्यास के भूल भी सकती है। दुनिया में कितनी-कितनी भाषाएं हैं। शास्त्रकार ने बताया कि ये विचित्र भाषाएं त्राण देने वाली नहीं होतीं। मंत्र आदि शिक्षण-प्रशिक्षण से भी त्राण नहीं मिलता। भाषाओं का उपयोग अच्छे कार्यों में हों तो भाषा का अच्छा लाभ हो सकता है। भाषा के अध्ययन से स्वयं सहित दूसरों का भी उपकार कर सकें, ऐसा प्रयास होना चाहिए। भाषा कर्म निर्जरा का भी माध्यम बने, ऐसा प्रयास होना चाहिए। आदमी को त्राण प्राप्ति के लिए सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र की आराधना से प्राप्त हो सकती है। भाषा इसमें सहयोगी बन सकती है। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं के विभिन्न आध्यात्मिक विषयों में प्रशिक्षण के उपरान्त परीक्षा के संदर्भ में अवगति देते हुए परीक्षा के परीक्षकों आदि के नामों की घोषणा भी की।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया। आचार्यश्री के जन्मोत्सव, पट्टोत्सव व दीक्षा दिवस के संदर्भ में चारित्रात्माओं की प्रस्तुति का क्रम आज भी जारी रहा। इस अवसर पर मुनि लक्ष्यकुमारजी, मुनि मुकेशकुमारजी, साध्वी संस्कृतिप्रभाजी, साध्वी जिनयशाजी, साध्वी स्वस्थप्रभाजी, समणी हर्षप्रज्ञाजी, साध्वी वैभवयशाजी, साध्वी कर्त्तव्ययशाजी, साध्वी विकासप्रभाजी, साध्वी मार्दवयशाजी व समणी अपूर्वप्रज्ञाजी ने अपने आराध्य की अभिवन्दना में अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।



