धर्मसामाजिक/ धार्मिक

चरित्र बने निर्मल : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण 

आचार्यश्री ने ‘अचौर्य महाव्रत (अनुशासन पर्व) को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित

योग महोत्सव के 66वें कांउन्टडाउन दिवस पर पूज्य सन्निधि में हुआ योगाभ्यास का आयोजन                   लाडनूं :गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘अचौर्य महाव्रत (अनुशासन पर्व)’ को विवेचित करते हुए कहा कि ज्ञानी, विद्वान साधु को धर्म का आचरण करना चाहिए। साधु का धर्म है- पांच महाव्रत। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्म और अपरिग्रह। इनके प्रति साधु की सजगता रहे। साधु का विचार साधुता के भावों से ओतप्रोत रहना चाहिए। अहिंसा की साधना, दया, करुणा के भाव हों।                                                                                                                                       

वर्तमान में हमारे यहां तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, महामना आचार्यश्री भिक्षु की तीन सौवां जन्म वर्ष चल रहा है, जिसे भिक्षु चेतना वर्ष नाम दिया गया है। यह मानों पुनरावृत्ति हो रही है। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी के समय भी ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ हुआ था। आचार्यश्री भिक्षु हमारे धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता हुए। उनका कितना साहित्य है। उनके साहित्य में पंच महाव्रतों के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा दी गई है। इसके एक महाव्रत है-आचौर्य। साधु को अपनी प्रमाणिकता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। आचौर्य की साधना इतनी प्रबल हो कि बिना पूछे किसी की पुस्तक आदि को भी उठाने अथवा छूने से बचने का प्रयास होना चाहिए। बिना पूछे किसी को नहीं उठाना। कहीं रुकना है, किसी का घर आदि भी हो तो वहां आज्ञा लेकर ही ठहरना साधु की प्रमाणिकता के प्रमाण है। अचौर्य की आत्मा होती है प्रमाणिकता। साधु को दवा भी लेनी हो तो सूर्योदय के बाद ही उसके लिए आज्ञा लेने का प्रयास होना चाहिए। यह साधु की प्रमाणिकता होती है। हालांकि साधु को ज्यादा गृहस्थों के मकान रहना भी नहीं चाहिए। अचौर्य महाव्रत का अपना महत्त्व है।                                                                                                                             

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान करते हुए कहा कि साधु को अपने चारित्र को निर्मल बनाने का प्रयास किया जा सकता है। गर्मी को भी समता भाव से सहन करने का प्रयास करना चाहिए। नंगे पांव चलने से भी निर्जरा हो सकती है। भोजन में जमींकंद का प्रयोग न हो। जितना संभव हो, उसके प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। साधु को अपने नियमों के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिक्रमण भी पूर्णतया जागरूकता के साथ करने का प्रयास हो। आचार्यश्री ने मर्यादा पत्र का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को अनेकानेक प्रेरणाएं प्रदान कीं।

आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने साध्वीजी को सात कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया। सुधर्मा सभा में उपस्थित चारित्रात्माओं की विराट उपस्थिति एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रही थी। तदुपरान्त आचार्यश्री ने ‘हमारे भाग्य बड़े बलवान’ गीत का आंशिक संगान भी किया।

इसके पूर्व गुरुवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में आयुष मंत्रालय तथा मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की जागरूकता हेतु देश भर में सौ दिन पहले से ही जागरूकता अभियान का क्रम प्रारम्भ किया है। इस संदर्भ में 66वें काउन्टडाउन दिवस पर लोगों को जागरूक करने के लिए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में सुधर्मा सभा में जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के योग एवं जीवन विज्ञान विभाग द्वारा योग महोत्सव का आयोजन किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने समुपस्थित जनता को कुछ समय तक प्रेक्षाध्यान आदि का प्रयोग कराने के साथ ही विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं।

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