अहमदबादसामाजिक/ धार्मिक

अध्यात्म की साधना में हो ज्ञाता-द्रष्टा भाव : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

आध्यात्मिक अनुष्ठान का भी श्रद्धालुओं ने उठाया लाभ

 -प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को युगप्रधान आचार्यश्री ने कराया प्रेक्षाध्यान का प्रयोग

-25.09.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर (गुजरात) :प्रेक्षा विश्व भारती परिसर में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, सिद्ध साधक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्ष 2025 का चतुर्मासकाल सुसम्पन्न कर रहे हैं। वर्तमान में देश भर में शक्ति की आराधना की जा रही है तो महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम भी जारी है।

गुरुवार को भी ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित जनता अपने आराध्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ नवरात्र के संदर्भ में आध्यात्मिक अनुष्ठान जुड़ी। मंगल मंत्रों के समुच्चारण से पूरा वातावरण ऊर्जान्वित हो रहा था। आध्यात्मिक अनुष्ठान के उपरान्त महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि आयारो आगम में बताया गया है कि जो आत्मा है, वह ज्ञाता है और जो ज्ञाता है, वह आत्मा है। जिस साधन से आत्मा जानती है, वह ज्ञान आत्मा है। जैन दर्शन में आठ प्रकार की आत्माएं बताई गई हैं। एक द्रव्य आत्मा है, शेष सात आत्माएं भाव आत्माएं होती हैं। द्रव्य आत्मा सभी जीवों में होती है। उपयोग आत्मा भी हर जीव में प्राप्त होती है। दर्शन आत्मा भी सभी जीवों में होती हैं।

यहां यह बताया गया है कि कोई आत्मा ऐसी नहीं होती, अथवा कोई ऐसा जीव नहीं होता, जिसमें ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम न हो। प्रत्येक जीव में कुछ न कुछ ज्ञान होता ही है। प्रेक्षाध्यान में उपयोग आत्मा की सक्रियता को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। प्रेक्षाध्यान साधना में निर्मल उपयोग आत्मा रहे, उसके साथ कषाय न जुड़े। प्रियता और अप्रियता से बचने का प्रयास करना चाहिए। अध्यात्म की साधना में भी ज्ञाता-द्रष्टा भाव हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। आदमी को अनुकूलता और प्रतिकूलता से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। शुद्धोपयोग हो तो कितनी कर्म निर्जरा हो सकती है। प्रेक्षाध्यान में शुद्धोपयोग रहने का अभ्यास हो जाए तो अध्यात्म की साधना अच्छी हो सकती है। साधक को अधिक से अधिक शुद्धोपयोग में रहने का प्रयास करना चाहिए। कषाय आत्मा और योेग आत्मा जितनी निष्क्रिय रहे, उतना ही साधक के लिए अच्छा हो सकता है।

प्रेक्षाध्यान का शिविर चल रहा है। जितना संभव हो सके, शुद्धोपयोग में रहना और अच्छी बात हो सकती है। ध्यान में ज्यादा विचारों का प्रवाह न रहे। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने समुपस्थित प्रेक्षाध्यान शिविरार्थियों को कुछ देर के लिए प्रेक्षाध्यान का प्रयोग भी कराया।

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