
सूरत। कभी देश की “सिल्क सिटी” कहलाने वाला सूरत आज गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने साउथ गुजरात की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी है। पिछले 60 दिनों में उद्योग को करीब 3000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण धागा महंगा हो गया है, जिससे कपड़ा उत्पादन की लागत तेजी से बढ़ी है। दूसरी ओर बाजार में मांग कमजोर होने से उद्योग दोहरी मार झेल रहा है।
फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जीरावाला के अनुसार सूरत की अधिकांश वीविंग यूनिटें इस समय केवल 50 प्रतिशत क्षमता पर चल रही हैं। कई कारखानों में एक शिफ्ट पूरी तरह बंद कर दी गई है। उद्योगपतियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजदूरों को रोककर रखने की है। यदि उत्पादन और घटा तो हजारों कारीगर अपने गृह राज्यों की ओर लौट सकते हैं।
सूरत देश का सबसे बड़ा मैन-मेड फाइबर (MMF) हब माना जाता है और यहां की यार्न इंडस्ट्री सीधे कच्चे तेल पर निर्भर है। तेल महंगा होने से धागे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि तैयार कपड़े के खरीदार बाजार से गायब हैं। स्थिति यह है कि उद्योगपति उत्पादन जारी रखें तो नुकसान और बंद करें तो मजदूर व मशीनरी दोनों पर संकट।
टेक्सटाइल उद्योग ने अब सरकार से तत्काल राहत पैकेज की मांग की है। इंडस्ट्री की ओर से बिजली बिलों में सब्सिडी, बैंक ब्याज में राहत, लोन की किस्तों पर अस्थायी रोक तथा यार्न पर टैक्स ढांचे में बदलाव की मांग उठाई गई है। हाल ही में गांधीनगर में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठक में भी उद्योग की खराब स्थिति को प्रमुखता से उठाया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव जल्द कम नहीं हुआ और कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित नहीं हुईं, तो आने वाले महीनों में सूरत का टेक्सटाइल उद्योग और गहरे संकट में जा सकता है। उद्योग जगत का कहना है कि यह सिर्फ व्यापार बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोजी-रोटी बचाने की जंग है।



