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 अत्यंत दुर्लभ है धर्म श्रवण : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण 

- संघर्षों में भी शांति रखने हेतु गुरुदेव ने किया प्रेरित- शांतिदूत के दर्शनार्थ पहुंचे ग्रैमी पुरस्कार विजेता रिकी केज

29.03.2026, रविवार, लाडनूं:राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले स्थित जैन विश्व भारती, लाडनूं का सुरम्य परिसर इन दिनों युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के योगक्षेम वर्ष प्रवास के मंगल आयोजन से गुंजायमान है। प्रातःकालीन मंगल भ्रमण के दौरान गुरुदेव के पावन सानिध्य में जैन विश्व भारती द्वारा संचालित ‘महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल’ में नव-निर्मित महाश्रमण स्पोर्ट्स ग्राउंड का भव्य उद्घाटन संपन्न हुआ। इस गरिमापूर्ण अवसर पर कला और पर्यावरण के क्षेत्र में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुके, तीन बार के ग्रैमी पुरस्कार विजेता एवं पद्म श्री से सम्मानित प्रख्यात भारतीय संगीतकार रिकी केज ने भी लाडनूं पहुंचकर शांतिदूत आचार्य श्री के मंगल दर्शन और आशीर्वाद का लाभ प्राप्त किया।
गुरुदेव के मुख्य मंगल प्रवचन के पश्चात अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के तत्त्वावधान में आयोजित त्रि-दिवसीय विराट युवती सम्मेलन ‘संगम’ का मंचीय समारोह आयोजित हुआ, जिसमें युवतियों ने विभिन्न प्रस्तुतियां दी। महिला मंडल की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सुमन नाहटा से अपने विचार रखे।
इसी के साथ टोहाना से समागत श्रावक समाज की अर्जी पर मर्जी करते हुए पूज्य गुरुदेव ने वर्ष 2028 का ‘अक्षय तृतीया महोत्सव’ हरियाणा के टोहाना नगर में आयोजित करने की घोषणा की।
मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में गुरुदेव ने कहा कि 84 लाख जीव योनियों में मनुष्य का जन्म मिलना अत्यंत मुश्किल है, और मनुष्य देह प्राप्त करने के बाद भी धर्म की श्रुति यानी धर्म सुनने का अवसर अत्यंत दुर्लभ है।  मनुष्य को पांच बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, अच्छा सुनो, अच्छा देखो, अच्छा सोचो, अच्छा बोलो और अच्छा करो। जीवन में अच्छी बातें सुनने से मनुष्य के भाव शुद्ध होते हैं और प्रेरणा मिलने पर वह तप को स्वीकार कर लेता है। तपस्या का अर्थ केवल भूखा रहना ही नहीं है, बल्कि इसके बारह भेद हैं। आगमों का स्वाध्याय करना, ज्ञान कंठस्थ करना और प्रायश्चित करना भी तपस्या और श्रुत आराधना है। गुरुदेव ने सरलता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि बिना किसी छल-कपट या लुकाव-छिपाव के अपनी बड़ी से बड़ी गलती को स्वीकार कर लेना और प्रायश्चित के लिए प्रस्तुत हो जाना एक बहुत ऊंची बात है। यदि हम अपनी गलतियों के कांटे भीतर ही छिपा कर रख लेंगे, तो वे अगले जन्म में उसका परिणाम भोगना पड़ेगा। इसलिए आत्म शुद्धि कर लेना आवश्यक है, ताकि हमारी आत्मा का आगे का रास्ता प्रशस्त और साफ हो सके
विश्व को अहिंसा और शांति का संदेश देते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि अच्छी बातों को सुनकर आदमी क्षमा और अहिंसा को भी स्वीकार कर लेता है। आज विश्व में जो युद्ध की समस्याएं चल रही हैं, वहां यह समझना जरूरी है कि मनुष्य को युद्ध नहीं, शुद्ध बनना चाहिए। चारित्र आत्माओं का मूल धर्म अहिंसा, दया और समता है। परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी और जयाचार्य जैसे महापुरुषों ने भी अपने जीवन में आए अनेक विरोधों और संघर्षों को इसी प्रकार शांति व समता के साथ झेला था। हमें हमेशा अच्छी बातों को सुनने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि सुनने से ही मनुष्य शुद्धता, तप और अहिंसा के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ सकता है।
आचार्य प्रवर के सान्निध्य में जैन विश्व भारती में तपस्या का भी ठाठ लगा हुआ है। आज मुनि नमी कुमार जी ने 45 दिन की तपस्या का आचार्य श्री से प्रत्याख्यान किया। इससे पूर्व में भी आपने 62 दिन की तपस्या एवं अनेकों मासखमण सम्पन्न किए है।

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