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व्यवहार जगत में निक्षेप महत्त्वपूर्ण : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-वस्तु बोध की दृष्टि में निक्षेप विषय को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित-चारित्रात्माओं ने रखी जिज्ञासाएं, सुगुरु से मिला ज्ञानात्मक सामाधान

23.02.2026, सोमवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सुधर्मा सभा में योगक्षेम वर्ष का प्रातःकालीन प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। आचार्यश्री की कल्याणीवाणी का श्रवण करने के लिए प्रतिदिन जैन विश्व भारती में सेवार्थ पहुंच चुके श्रद्धालुओं के साथ-साथ लाडनूंवासी भी बड़ी संख्या में उपस्थिति देखने को मिल रही है।

सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ प्रारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी व्यवहार के जगत में जी रहा है। संसारी प्राणी जो भी हैं, उनमें भी विशेषतया जो संज्ञी मनुष्य हैं, उनके व्यवहार को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- शब्दाश्रयी व्यवहार, अर्थाश्रयी व्यवहार व ज्ञानाश्रयी व्यवहार। व्यवहार अर्थात् लेन-देन करना, किसी को बुलाना, कुछ कहना, कुछ सुनना, किसी वस्तु का आदान-प्रदान आदि-आदि जीवन के व्यवहार हैं। शरीर है तो अनेक व्यवहार भी अनिवार्य हो जाते हैं। सिद्ध भगवान ही एकमात्र व्यवहार से मुक्त होते हैं। व्यवहार की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए निक्षेप की आवश्यकता होती है। वस्तु बोध की दृष्टि निक्षेप है।

लगता तो यह है कि यदि निक्षेप की व्यवस्था न हो तो व्यवहार भी कठिनाइयों से भरा हुआ हो सकता है। शब्दाश्रयी, अर्थाश्रयी और ज्ञानाश्रयी तीनों की व्यवस्था में एकरूपता तो तो अच्छी बात हो सकती है। मान लिया जाए गुरु प्रमार्जनी मंगाई तो सुविनीत शिष्य प्रमार्जनी लेकर आए। इसमें देखा जाए तो प्रमार्जनी बोला तो शब्दाश्रयी से उस वस्तु विशेष की जानकारी होती है। अर्थाश्रयी से इस बात का प्रतिबोध होता है कि प्रमार्जनी इसी वस्तु को कहा जाता है। अगर यह बोध न हो तो इसी वस्तु का नाम प्रमार्जनी है तो फिर वह वस्तु कहां से आएगी। नियत, निश्चित वस्तु का बोध कराने वाला निक्षेप होता है।

वस्तु को जानने के लिए नाम निक्षेप की कितनी आवश्यकता होती है। इसी प्रकार किसी आकृति को देखने मात्र से उसका नाम आदि ध्यान में आ जाता है, यह बिना शब्द के बोध हो जाना स्थापना निक्षेप का परिणाम के कारण होता है। निक्षेप आदमी के व्यवहार जगत में बहुत काम आने वाला होता है। इसलिए व्यवहार में निक्षेप का बहुत बड़ा हाथ होता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि वस्तु बोध की दृष्टि ही निक्षेप है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी समाहित किया। अनेकानेक चारित्रात्माओं की जिज्ञासा और आचार्यश्री द्वारा प्रदान किए गए समाधान सभी के ज्ञान का वर्धन कराने वाला रहा।

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