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दुख का कारण है आसक्ति और तृष्णा : युगप्रधान आचार्य

रहो भीतर जिओ बाहर के लिए गुरूदेव ने किया प्रेरित

11.09.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर।जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में। चातुर्मास कालीन धर्म आराधना निरंतर गतिमान है। जिसमें न केवल अहमदाबाद अपितु देश के कोने कोने से आने वाले हजारों श्रद्धालु भी अध्यात्म चेतना से भावित हो रहे है। प्रेक्षा विश्व भारती का प्रांगण में मानों मेले का माहौल है। मेला कोई मौज मस्ती या खाने पीने का नहीं अपितु अध्यात्म का मेला, अध्यात्म रश्मियों आलोकित होने का यह मेला है। आयारो आगम पर गुरूदेव का पावन प्रवचन भी लोगों को नित नवीन तत्व ज्ञान से बोधित कर रहा है।

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि आत्मा और शरीर दो तत्व है। आत्मा आध्यात्मिक तो शरीर पोद्गलिक, भौतिक तत्व है। हम जितना आसक्ति, लोभ और तृष्णा में जायेंगे उतना ही आत्मा के स्वभाव से दूर होते चले जाएंगे। जैसे जैसे अध्यात्म हमारे जीवन में आता है उतना फिर बाहरी विषय जगत से आकर्षण भी कम होने लग जाता है। व्यक्ति भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर बढ़े। जितना आकर्षण, जितनी आसक्ति होगी उतना ही दुख होगा। सुख के लिए अनासक्त होना जरूरी है। जितना व्यक्ति आसक्ति से दूर होता है उतना ही भीतर में सुख एवं शांति होती है। भौतिक आकर्षण के सुख ये क्षणमात्र के है। पदार्थों की अपेक्षा हम आत्मा के आसपास रहे। रहो भीतर जिओ बाहर यह सूत्र जीवन में व्यक्ति अपनाएं यह आवश्यक है।

गुरूदेव ने आगे कहा कि मुख्य को मुख्यता देनी चाहिए और गौण को और गौण करना चाहिए। मुख्य हमारी आत्मा है। दुनिया में जीते हुए भी अपने आप में रहे। खाद्य पदार्थ, अन्य वस्तुओं के प्रति लगाव और आसक्ति नहीं होनी चाहिए। जीवन में संयम रहना चाहिए। तपस्या, सामायिक, पौषध, स्वाध्याय आदि धार्मिक आराधना आत्मा के पास रहने की साधना है।

इस अवसर पर राणावास राजस्थान से समागत श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी मानव हितकारी संघ के अध्यक्ष श्री पी. मोहन गादीया ने अपने विचार रखे। संस्थान के विद्यार्थियों ने सामूहिक गीत का संगान किया।

 

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