आचरणों में उतरे धर्म : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
गुजराती नववर्ष के संदर्भ में बृहत् मंगलपाठ श्रवण को उमड़ा श्रद्धा का सैलाब5

-सघन साधना शिविर को शिविरार्थियों को मिला मंगल पाथेय
-शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं को शांतिदूत ने किया समाहित
22.10.2025, बुधवार,कोबा, गांधीनगर (गुजरात)।गुजरात राज्य के कोबा में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में विराजमान जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को प्रातः करीब 6.40 बजे के आसपास गुजरातवासियों के नूतन वर्ष (बेसता नववर्ष) के संदर्भ में बृहत् मंगलपाठ सुनाया। आचार्यश्री से मंगलपाठ का श्रवण करने को मारों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ आया। उमड़ी जनता के समक्ष मानों ‘वीर भिक्षु समवसरण’ का विशाल प्रांगण भी जनाकीर्ण नजर आ रहा था। आचार्यश्री ने गुजराती नववर्ष के संदर्भ में जनता को मंगलपाठ का श्रवण कराने के साथ ही पावन पाथेय भी प्रदान किया।

नववर्ष से संदर्भित मंगलपाठ व पावन पाथेय के उपरान्त आचार्यश्री पुनः प्रवास कक्ष में पधारे और कुछ समय उपरान्त पुनः प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए प्रवचन पण्डाल में पधार गए। अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के माध्यम समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि धर्म को जानकर साधु श्रमण धर्म का पालन करते हैं। धर्म को जान लेना एक उपलब्धि है। जीवन में कितना उतरेगा अथवा नहीं उतर पाएगा, वह बाद की बात है, धर्म को अच्छी तरह जान लेना और श्रद्धा कर लेना भी बहुत बड़ी उपलब्धि हो जाती है। किसी चीज को हम अच्छी तरह जान लेते हैं और उस पर कुछ रूचि अथवा श्रद्धा हो जाती है तो उसका पालन भी किया जा सकता है। धर्म का बोध तीर्थंकरों से प्राप्त हो सकता है। तीर्थंकर से बड़ा ज्ञानी तो दुनिया में किसी के पास नहीं है। अध्यात्म के अनुत्तर प्रवक्ता तीर्थंकर होते हैं।
चीटीं कितनी छोटी होती है, लेकिन गति करती है तो कितने योजन का सफर तय कर लेती है और कोई गरुड़ पक्षी है, लेकिन वह उड़ान ही नहीं भरे तो कितनी दूरी तय कर सकता है। कुछ प्राप्त करने के लिए गतिशील होना आवश्यक होता है। चलने के लिए धर्मास्तिकाय का सहयोग और ठहरने के लिए अधर्मास्तिकाय का सहयोग मिलता है।
प्रवचनों का श्रवण, शास्त्रों का अध्ययन, कक्षाओं आदि में उपस्थिति, तत्त्वचर्चा से धर्म का बोध हो सकता है। जिनमें ज्ञान भी है और आचरण भी है, वैसे लोग कम ही होते हैं। भगवान महावीर के पास ज्ञान भी था और वे आचरण में लगे तो तीर्थंकर बन गए और वे अपनी परम मंजिल मोक्ष को भी प्राप्त हो गए। आदमी को पहले जानना अपेक्षित होता है।

आचार्यश्री भिक्षु का जन्म त्रिशताब्दी वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के रूप में चल रहा है। वे हमारे धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, प्रवर्तक आचार्य थे। अभी कुछ दिनों बाद ही गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी को दीक्षा लिए हुए सौ वर्ष पूरे होने वाले हैं। वे बालमुनि के रूप में आचार्यश्री कालूगणी के पास दीक्षित हुए। मुनि बने, युवाचार्य बने, आचार्य बने, युगप्रधान बने और फिर गणाधिपति बन गए। उसी प्रकार आदमी को धर्म को जानकर धर्म को अपने व्यवहार व आचरण में लाने का प्रयास करना चाहिए। जान लेने के बाद कार्य किया जाए तो परिपूर्णता की बात होती है। इसलिए आदमी धर्म को जानकर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
सघन साधना शिविर के सहभागी बालक-बालिकाओं को आचार्यश्री ने अपनी जिज्ञासाओं को अभिव्यक्त करने की अनुमति दी तो शिविरार्थियों ने अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया तो आचार्यश्री ने उन्हें मंगल समाधान प्रदान किया। शिविरार्थी ऐसे सौभाग्य को प्राप्त कर धन्य-धन्य महसूस कर रहे थे।




