क्षमा के साथ जीवन जीना ही श्रेष्ठ, प्राणी मात्र के प्रति क्षमा का भाव रखें – मुनि अजित
दसलक्षण पर्व के बाद क्षमावाणी दिवस का आयोजन

सूरत। श्री दिगंबर जैन समाज, सूरत की ओर से सोमवार को पर्युषण पर्व की समाप्ति के उपरांत क्षमावाणी पर्व का आयोजन सीटीलाईट स्थित तेरापंथ भवन के शुभम हॉल में किया गया। इस अवसर पर धर्मसभा का आयोजन हुआ जिसमें विभिन्न संतों ने क्षमा के महत्व पर अपने विचार रखे।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए ऐलक विवेक नंद सागर ने कहा कि दूसरों को दुख देकर नहीं बल्कि सुख देकर जीना ही क्षमावाणी पर्व का वास्तविक अर्थ है। आत्मा में बदले की भावना न रखना, दुर्व्यवहार सहने वालों से क्षमा माँगना और उन्हें क्षमा करना ही क्षमा की सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि क्षमावाणी का पर्व सर्वमैत्री दिवस के रूप में मनाकर एक-दूसरे को क्षमा करना चाहिए।
मुनि निराग सागर महाराज ने कहा कि जैसे नींबू की एक बूंद दूध को फाड़ देती है, वैसे ही कषाय का एक कण भी रिश्तों में दरार डाल देता है। इसलिए क्षमा के साथ जीवन जीना ही श्रेष्ठ है। प्राणी मात्र के प्रति यह भाव रखना चाहिए कि जैसे हमारी आत्मा है, वैसे ही सबकी आत्मा है। यही धर्म रूपी चेतना हमें मित्रता का पाठ पढ़ाती है।
मुनि शुभम कीर्ति महाराज ने कहा कि घर की सफाई तो हम रोज करते हैं, अब हृदय की सफाई करें। हृदय को साफ करना ही क्षमा है। कषाय से किसी का भी हित नहीं होता बल्कि अहित ही होता है। केवल मुक्ति की भावना रखने से मुक्ति नहीं मिलती, उसके अनुरूप आचरण भी आवश्यक है। क्षमा की क्षमता पृथ्वी जैसी व्यापक होनी चाहिए।

मुनि अजीत सागर महाराज ने कहा कि क्षमा केवल वाणी में नहीं बल्कि प्राणी में होनी चाहिए। छोटे के प्रति विनम्रता और बड़े के प्रति सम्मान रखते हुए परिवार को विघटन से बचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार का विघटन हमें सुविधा तो दे सकता है लेकिन सुरक्षा कभी नहीं दे सकता। जब प्रकृति अपना स्वभाव नहीं छोड़ती तो हमें भी क्षणिक सुख के लिए अपना धर्मस्वभाव नहीं छोड़ना चाहिए।
सभी संतों ने क्षमावाणी पर्व के अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे क्षमा के भाव को आत्मसात कर जीवन को श्रेष्ठ बनाएं और भूलों को भूलकर आत्मा की शुद्धि का मार्ग अपनाएँ।




