विशिष्ट आत्मा थे आचार्य भिक्षु : आचार्य श्री महाश्रमण
तेरापंथ के आद्य प्रणेता आचार्य भिक्षु का 223 वां चरमोत्सव समारोह

– गुरू भिक्षु की शिक्षाओं को आचार्यश्री ने किया व्याख्यायित
05.09.2025, शुक्रवार, कोबा, गांधीनगर।प्रेक्षा विश्व भारती के प्रांगण में आज तेरापंथ के आद्य प्रणेता आचार्य श्री भिक्षु का 223 वां चरमोत्सव दिवस समायोजित हुआ। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में भादवा सुदी तेरस पर चतुर्विध धर्मसंघ द्वारा आचार्य श्री भिक्षु का महाप्रयाण दिवस श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया। भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी के दूसरे चरण के तहत कार्यक्रम में संत वृंद की सामूहिक गीत की प्रस्तुति हुई। वहीं तेरापंथ युवक परिषद अहमदाबाद के युवकों ने भी गीतिका द्वारा श्रद्धाभिव्यक्ति दी। अनेकानेक श्रद्धालुओं ने आज उपवास तेले आदि द्वारा भी आराध्य के प्रति तप द्वारा श्रद्धा व्यक्त की।

मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में मंगल उद्बोधन फरमाते हुए गुरुदेव ने कहा – समय समय पर जब धर्म का ह्रास होता है तब तब इसी आत्माएं अवतरित होती है जो पुनः धर्म की स्थापना करती है। आचार्य भिक्षु एक विशिष्ट आत्मा थे। वें जब गर्भ में आए तब उनकी माता ने सिंह का स्वप्न देखा था। तीर्थंकरों की माताएं सिंह का स्वप्न देखती है। भगवान महावीर की माता ने सिंह का स्वप्न देखा। आचार्य भिक्षु जैसे साधु की मां अगर सिंह का स्वप्न देखे तो कोई आश्चर्य नहीं। उन्होंने अभिनिष्क्रमण किया। एक संप्रदाय से निकल कर उन्होंने धर्म क्रांति की। वैचारिक और आचारिक भिन्नता के साथ वे आगे बढ़ते गए। अपने पुरुषार्थ से उन्होंने एक नई राह बनाई औरों के मन में भी धर्म के प्रति चाह पैदा की। समय समय पर ऐसी क्रांतियों की उपयोगिता भी होती है। ऐसे व्यक्तियों की दुनिया में महत्ता होती है। आज 265 वर्षों के पश्चात भी उनकी यह परम्परा चलती आ रही है। उन्होंने तेजस्वी और निर्मल साधुपन का आचरण किया।

आचार्य प्रवर ने आगे कहा कि गुरू भिक्षु की मर्यादाएं आज भी उसी रूप में धर्मसंघ में चलती आ रही है। एक आचार्य के सभी शिष्य होते है, आचार्य द्वारा निर्णीत उत्तराधिकारी सभी को मान्य होता है। दीक्षा भी हर किसी को नहीं, देख परख कर दी जाती है। ऐसी मर्यादाएं सिर्फ किताबों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी आज पालन हो रही है। अंतिम मास में उन्होंने संघ को परस्पर सौहार्द रखने की प्रेरणा दी। सिर्फ साधु साध्वियां ही नहीं श्रावक समाज के लिए भी वह प्रेरणाएं है। परस्पर सौहार्द, अनावश्यक कलह नहीं और जहां रहे समाधि में रहे। हमारा संघ आज भी इन शिक्षाओं में 100 प्रतिशत या कहूं 99 प्रतिशत चल रहा है। समण श्रेणी का नया आयाम आचार्य श्री तुलसी के द्वारा प्रारंभ हुआ। जो विदेशों में भी जाकर धर्मप्रचार का कार्य कर रही है। स्वामी जी के श्रावक समाज में भी इतना भक्ति भाव देखने को मिलता है। उनके आशीर्वाद से यह धर्मसंघ नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर रहा है।
इसके बाद गुरूदेव ने आज के दिवस हेतु स्व रचित गीत का संगान किया।कार्यक्रम में मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार जी, साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने भी सारगर्भित उद्बोधन प्रदान किया।




