चेक बाउंस मामले में तमिलनाडु के व्यापारी को 6 माह की सजा और 12 लाख रुपये जुर्माना चुकाने का आदेश
सूरत की अदालत का अहम फैसला, जुर्माने की पूरी राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में देने का आदेश

सूरत। व्यापारिक लेन-देन में बढ़ते चेक बाउंस मामलों के बीच सूरत की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया है। सूरत की छठी अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) अदालत ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत आरोपी को दोषी ठहराते हुए छह माह के कठोर कारावास और 12 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने आदेश दिया कि जुर्माने की पूरी राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में अदा की जाए।
मामले के अनुसार, गुजरात किरण पॉलीटेक्स लिमिटेड के निदेशक महेशभाई मोतीरामभाई गोदीवाला ने तमिलनाडु स्थित रेनुगंबल ट्रेडर्स के प्रोपराइटर पलानीबाबु के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। आरोपी ने व्यापारिक लेन-देन के तहत शिकायतकर्ता से डाइड यार्न खरीदने के बाद बकाया भुगतान के लिए 7,80,149 रुपये का चेक जारी किया था। जब शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में प्रस्तुत किया तो वह “फंड्स इनसफिशिएंट” (पर्याप्त धनराशि नहीं होने) के कारण अनादृत हो गया। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद आरोपी ने भुगतान नहीं किया, जिसके बाद अदालत में परिवाद दायर किया गया।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से बिल, जीएसटी दस्तावेज, ई-वे बिल, परिवहन संबंधी दस्तावेज, बैंक स्टेटमेंट, चेक, बैंक रिटर्न मेमो तथा कानूनी नोटिस सहित सभी आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य अदालत में पेश किए गए। वहीं आरोपी अपनी ओर से कोई विश्वसनीय बचाव प्रस्तुत नहीं कर सका।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज विश्वसनीय हैं और आरोपी कानूनी अनुमान को खंडित करने में पूरी तरह विफल रहा। साथ ही अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी बार-बार न्यायालय में अनुपस्थित रहकर न्यायिक प्रक्रिया को टालने का प्रयास करता रहा।
अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यापारिक लेन-देन में चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है और चेक बाउंस जैसे मामलों में कानून का सख्ती से पालन होना चाहिए। इसे व्यापारिक जगत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विरल मेहता ने प्रभावी पैरवी की, जिसके आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए यह फैसला सुनाया।



