युवाचार्य वर्धापना समारोह : चतुर्विध धर्मसंघ ने युवाचार्य को किया वर्धापित
युवाचार्य महावीर में होता रहे श्रुत, शरीर, वचन संपदा का विकास : शांतिदूत महाश्रमण

विनम्रता, संयम, आगम व अनुशासन निष्ठा बढ़ती रहे : साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी
साधु, साध्वी व समणीवृंद व श्रावक-श्राविकाओं ने गीत गायन से भी किया वर्धापित
अनेक चारित्रात्माओं व संस्थाओं के पदाधिकारियों ने युवाचार्यश्री की अभिवंदना में दी अभिव्यक्ति 30.07.2026, गुरुवार, लाडनूं :
गत 27 जुलाई 2026 को आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष सम्पन्नता समारोह के अंतिम दिन, अर्थात् आचार्यश्री भिक्षु के जन्मदिवस के दिन जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर बनी जैन विश्व भारती परिसर के सुधर्मा सभा में मुख्यमुनि महावीरकुमारजी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए युवाचार्य पद पर नियुक्त किया तो मानों तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में एक नवीन अध्याय का सृजन हो गया। सम्पूर्ण तेरापंथ समाज हर्षविभोर हो उठा। युगप्रधान अनुशास्ता ने उसी दिन 30-31 जुलाई को युवाचार्य वर्धापना समारोह की भी घोषणा की थी।
उस घोषणा के अनुसार गुरुवार को सुधर्मा सभा में युवाचार्य वर्धापना समारोह का शुभारम्भ हुआ। विशाल सुधर्मा सभा श्रद्धालुओं व चारित्रात्माओं की विराट उपस्थिति से मानों जनाकीर्ण नजर आ रही थी। इसी दौरान वर्तमान तेरापंथाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपने सुशिष्य युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी के साथ मंचासीन हुए तो पूरा वातावरण जयघोष गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ युवाचार्य वर्धापना समारोह का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृंद ने प्रतिदिन के अनुसार प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने कुछ समय के लिए ध्यान का प्रयोग कराया। तत्पश्चात शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘ज्ञान से मुनि होता है’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि ज्ञान का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। मोक्ष के साधनों में सम्यक् ज्ञान भी एक आयाम है। ज्ञानावरणीय कर्म के साथ ज्ञान का अभाव जुड़ा हुआ है। ज्यों-ज्यों ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण होता जाता है, ज्ञान की प्रकटता की स्थिति बढ़ती चली जाती है। ज्ञानावरणीय कर्म का या तो उदय हो सकता है, या क्षयोपशम हो सकता है या क्षय हो सकता है। साधु-साध्वियों व समणियां, चाहे कोई भी हो, जितना अवकाश मिले, स्वाध्याय का क्रम चलना चाहिए। कोई अच्छे ग्रन्थ के स्वाध्याय में समय लगाने का प्रयास होना चाहिए। 

प्रज्ञा-प्रतिभा ज्ञान प्राप्ति का बड़ा साधन है। कोई पात्र होता है तो पानी को ले जाया जा सकता है। इसी प्रकार प्रज्ञा-प्रतिभा, बुद्धि मानों एक बर्तन के समान है, जिसमें ज्ञान रूपी जल को डाला जा सकता है। पुस्तक एक साधन है। जिस विद्यार्थी में प्रतिभा-प्रज्ञा न हो, उसके लिए पुस्तक और शिक्षक भी भला क्या कर पाएगा। ज्ञान अनेक प्रकार का हो सकता है। किसी भी विषय का ज्ञान है, वह उपलब्धि होती है, लेकिन ज्ञान-ज्ञान में अंतर होता है। कहीं लड़ाई-झगड़े की बात पढ़ी जाए और कहीं मारकाट की बात हो तो वहां दूसरा भाव हो सकता है और कहीं अच्छे फोटो या किताब सामने आए तो वैसा भाव हो सकता है। आगम अथवा कोई अन्य अच्छे ग्रंथ पढ़ें जाए तो अच्छा ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
मुनि वह होता है जो ज्ञानी होता है। ज्ञान के अभ्यास से मुनित्व का विकास हो सकता है। युवाचार्य महावीर ने मानों श्रुत की आराधना भी की है। वर्षों तक ज्ञान की आराधना से संपृक्त रहे हैं। वर्षों तक एम.ए., पीएचडी फिर भगवती जोड़ के स्वाध्याय में संपृक्त रहे हैं। जितना संभव हो सके, श्रुत की संपदा रहे। शरीर संपदा भी सक्षम रहनी चाहिए। लम्बा विहार करना हो, व्याख्यान देना हो और भी कोई कार्य करना हो तो शरीर की सक्षमता अच्छी रहनी चाहिए। शरीर संपदा, वचन संपदा भी अच्छी हो। निर्मल मति रहे। कोई निर्णय करना हो तो सही निर्णय सही समय पर हो सकता है। आचार संपदा भी बहुत अच्छे रूप में विकसित होते रहें। युवाचार्य महावीर ने बचपन से ही ज्ञान के क्रम से जुड़े रहे हैं। व्याख्यान देने से पहले अच्छी तैयार हो जाए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। आशु भाषण, आशु व्याख्यान आदि की क्षमता का भी विकास होना चाहिए। वैसे तो इन्हें श्रेष्ठ श्रुताराधक की डिग्री भी कभी मिली हुई है। और भी जितना श्रुत का अभ्यास होता रहे, श्रुत पुष्ट होता रहे।
आचार्यश्री के मंगल आशीर्वचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने युवाचार्यश्री को वर्धापित करते हुए कहा कि सबसे पहले मैं आचार्यश्री भिक्षु को वर्धापित करूंगी, जिन्होंने संघ को एक आचार्य की नेतृत्व परंपरा का सूत्रपात किया और फिर वर्धापना करती हूं तेरापंथ धर्मसंघ एकादश अधिशास्ता परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी को जिन्होंने एक सुयोग्य शिष्य को परखा। धीरे-धीरे आगे बढ़ाया और संघ फलक पर प्रतिष्ठित किया। मैं युवाचार्य को एक शैक्ष मुनि के रूप में देखा तो मैंने अनुभव किया कि सहजता, निश्चलता और सेवा भावना बनी हुई है। आप प्रतिभा सम्पन्न हैं। आपकी ज्ञान यात्रा आगे चलती रहे। आप पहले युवाचार्य हैं, जिन्हें डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त है। आप अपने मधुर संगान से पूरे परिषद को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। मैं यही मंगलकामना करती हूं कि विनम्रता, संयमनिष्ठा, आगमनिष्ठा, अनुशासन निष्ठा वृद्धिंगत होता रहे और संघ को आगे बढ़ाते रहें।
तदुपरान्त शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी ने युवाचार्यश्री को वर्धापित किया। साध्वीवृंद ने वर्धापना में गीत का संगान किया। समणीवृंद ने भी युवाचार्यश्री को वर्धापित करते हुए गीत का संगान किया। मुनि ऋषभकुमारजी, मुनि कुमारश्रमणजी, मुनि मननकुमारजी, मुनि नयकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। युवाचार्यश्री के परिवार की ओर से श्री सुमेर कोचर ने अपनी अभिव्यक्ति दी तथा कोचर परिवार ने अपने लाल के प्रति वर्धापना में गीत का संगान किया। साध्वी ऋतंभराजी ने गीत का संगान किया। साध्वी मुदितयशाजी, साध्वी सुमतिप्रभाजी, साध्वी सूरजप्रभाजी, समणी कुसुमप्रज्ञाजी, समणी भावितप्रज्ञाजी, साध्वी कीर्तिलताजी, साध्वी शांतिलताजी, साध्वी श्रुतयशाजी, साध्वी सरस्वतीजी, साध्वी जिनबालाजी, मुनि विजयकुमारजी, मुनि कमलकुमारजी, मुनि रणजीतकुमारजी, मुनि जम्बूकुमारजी (सरदारशहर) ने अपने-अपने ढंग से वर्धापित किया।
तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं ने गीत का संगान करते हुए युवाचार्य की वर्धापना से संदर्भित कटआउट समर्पित किया। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़, जैन विश्व भारती के इंस्टिट्यूट के वाइस चांसलर श्री बच्छराज दुगड़, अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के अध्यक्ष श्री प्रताप दुगड़, अमृतवाणी के अध्यक्ष श्री ललित दुगड़, आचार्य भिक्षु समाधि स्थल, सिरियारी के महामंत्री श्री मर्यादा कोठारी, आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान, गंगाशहर के अध्यक्ष श्री गणेश बोथरा, प्रेक्षा इण्टरनेशनल के अध्यक्ष श्री सम्पतमल नाहटा, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास की ओर से श्री केसी जैन ने भी युवाचार्यश्री को वर्धापित किया।



