पाल स्थित ‘वीर अमनता’ संकुल में नेमिनाथ प्रभु की अंजनशलाका एवं प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न

सूरत। पाल स्थित ‘वीर अमनता’ संकुल में रैवतगिरि मंडल द्वारा श्री नेमिनाथ प्रभु की अंजनशलाका एवं प्रतिष्ठा महोत्सव वैराग्यवारिधि जैनाचार्य पूज्य कुलचंद्रसूरिजी महाराज सहित छह सौरिवरों की पावन निश्रा में हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर सुबह 9 बजे मुमुक्षु चेतनभाई, मुमुक्षु आंचलबेन और मुमुक्षु तुष्टिबेन की भागवती प्रव्रज्या हुई, जबकि गणिवर श्री हेमप्रभविजयजी महाराज को पन्यास पदवी से विभूषित किया गया। इस पावन अवसर पर शताधिक पूज्य श्रमण-श्रावणी भगवंतों की गरिमामय उपस्थिति रही।
हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सबसे पहले तीनों मुमुक्षुओं को विजय तिलक कराया गया। इसे जैन संघ द्वारा उनके प्रति विश्वास का प्रतीक बताया गया और मोह रूपी शत्रु पर विजय का तिलक कहा गया। इसके बाद तीनों मुमुक्षुओं ने आचार्यश्री से मुंडन, वेश परिवर्तन और प्रव्रज्या के लिए शक्ति प्रदान करने की विनती की।
जब जैनाचार्य कुलचंद्रसूरिजी महाराज ने नवदीक्षितों को रजोहरण प्रदान किया, तब तीनों मुमुक्षु आनंद से झूम उठे। इस अवसर पर बताया गया कि संसार के सभी प्रकार के पापों से मुक्ति का मार्ग श्रमण-श्रमणी जीवन है और संयम ही आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है। तीनों मुमुक्षुओं के संयम जीवन के उपक्रमों तथा पन्यास पदवी प्राप्त करने वाले पन्यास हेमप्रभविजयजी की उछामणी पट्ट, आसन और नवकारवाली भावुक श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक अर्पित की।
नवदीक्षितों के संन्यास नाम भी घोषित किए गए। संन्यास लेने वाले चेतनभाई का नाम मुनीश्री अध्यात्मयोगी विजयजी महाराज, आंचलबेन का नाम साध्वी श्री असंगरेखाश्रीजी तथा तुष्टिबेन का नाम साध्वी श्री तीर्थनेमि वर्धनाश्रीजी रखा गया। तीनों नवदीक्षितों तथा नवपदवीधारी पन्यासप्रवर का श्रद्धालुओं ने अक्षत से स्वागत किया।
इस अवसर पर जैनाचार्य पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने कहा कि जिसे भगवान प्रिय लगते हैं, उसे अभिव्रज्या कहा जाता है, और जिसे भगवान के अलावा कुछ भी प्रिय न हो, वही सच्ची प्रव्रज्या है। जैन धर्म की दीक्षा एक अद्भुत और प्रेरणादायी घटना होती है।




