
नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज़ और डी-फ्रीज़ करने के लिए एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाने के मुद्दे पर विचार करने पर सहमति जताई है। यह निर्देश केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के लिए मांगा गया है।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने याचिका की प्रति तीन दिनों के भीतर केंद्र सरकार को सौंपने का आदेश दिया है। इस मामले की अगले सप्ताह आगे की सुनवाई की जाएगी।
याचिका में दलील दी गई है कि देशभर की साइबर सेल द्वारा बैंक खाते फ्रीज़ किए जाने से संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) और 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज़ और डी-फ्रीज़ करने के लिए देशभर में एक समान SOP बनाई जाए, ताकि मनमानी कार्रवाई रोकी जा सके और प्रक्रियागत न्याय सुनिश्चित हो।
याचिकाकर्ता का कहना है कि उनके मामले में खाते फ्रीज़ होने से उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई, जिसके कारण वे आवश्यक खर्च, करों का भुगतान तथा व्यावसायिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर सके।
याचिका में यह भी कहा गया कि बीएनएसएस/सीआरपीसी की धारा 102(3) के अनुरूप धारा 106(3) के तहत किसी भी संपत्ति की जब्ती या खाते फ्रीज़ करने की सूचना तत्काल संबंधित मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है, लेकिन उनके मामले में इसका पालन नहीं हुआ। इसलिए संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर, मनमानी और असंवैधानिक बताई गई




