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कष्टों को कर्म सिद्धांत मानकर सहन करो | – आचार्य शिवमुनि

सूरत।आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि भेदज्ञान, कर्म सिद्धांत और अनेकांतवाद ये तीन सिद्धांत भगवान महावीर के हैं। भेद ज्ञान कर आत्मा में जितने गहरे उतर जाओगे तो कष्ट नहीं होगा। प्रभु महावीर ध्यान में गहरे उतर गये, अनेक कष्ट आए फिर भी भगवान शांत रहे, क्योंकि वे भेद विज्ञान में रहे अर्थात् जड़-जीव का भेद किया। जड़ जीव का भेद कर लिया तो आत्मा को कष्ट नहीं हो सकता।

आचार्य भगवन ने समाधि तंत्र ग्रंथ की चर्चा करते हुए फरमाया कि इस ग्रंथ के व्याख्याता आचार्य पूज्यपाद थे, जिनका जन्म पांचवी सदी में कर्नाटक प्रदेश के कोयलाना ग्राम हुआ उनकी माता का नाम श्रीदेवी, पिता का नाम था माधव भट था। आचार्य पूज्यपाद प्रखर बुद्धि के थे उनकी प्रखर बुद्धि के कारण उनका नाम जिनेन्द्र पड़ गया। सांप के मुंह में मेंढक को देखकर उनको वैराग्य हो गया कि यह संसार कैसा है जो एक-दूसरे को निगल रहा है। उन्होंने संसार को छोड़ दिया और दीक्षा ले ली। उनकी इतनी प्रखर साधना थी कि उन्हें देवता भी पूजते थे।

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि धर्म की क्रिया अलग है, वास्तविक आत्म धर्म जिसके जीवन में आ जाता है उसके जीवन का कल्याण हो जाता है। कबीर, रामकृष्ण परमहंस, श्रमण संघ के प्रथम आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मारामजी म.सा. ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके जीवन में धर्म था। आचार्य आत्मारामजी म.सा. को अनेक शारीरिक कष्ट आए फिर भी उन्होंने उसे समभाव से सहन किया। उनकी हड्डी टूट गई, क्लोरोफार्म बिना सुंघाए ही डॉक्टर ने उपचार कर दिया। कोई भी व्यक्ति के जीवन में यदि बड़े से बड़ा शारीरिक कष्ट आए तो जड़-जीव का भेद कर दो कि कष्ट तो शरीर पर आया है। कर्म शरीर ने किया है तो उसे शरीर ही भोगेगा। जीवन में अपमान, नुकसान हो जाए, रोग आ जाए तो भी अपने कर्म सिद्धांत को मानकर सहन करो। जब जीव जीव में ठहर जाए तो कभी कष्ट नहीं होगा।

इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में मिथ्यात्व के प्रकारों की चर्चा करते हुए फरमाया कि मिथ्यात्व बहुत बड़ा पाप है। मिथ्यात्व टूट कर सम्यक्त्व आ गया और सम्यक्त्व से क्षायिक समकीत हो गए तो अनादिकाल की यात्रा से परिसिमित हो सकते हैं यानि कुछ भवों के बाद मुक्ति हो सकती है। बंध का दूसरा भेद अविरति को बताते हुए फरमाया कि स्वरूप और विषय की अपेक्षा से अविरति के बारह भेद है।

श्री शाश्वत मुनि जी म. सा. ने ‘‘आत्म भावों को हर दम निहारा करो’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।

लुधियाना से अमित जैन, दिल्ली से अजय जैन, कोटा से सुधीर जैन सपरिवार गुरु चरणों में उपस्थित हुए।

ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वाले उपवास, एकासन, आयंबिल आदि की पचक्खान करवाया।

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