राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

पापाचरणों से आत्मा की रक्षा लोकोत्तर दया : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

10 कि.मी. का विहार कर शांतिदूत पहुंचे कैराप गांव राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पूज्यचरणों से हुआ पावन चतुर्दशी के संदर्भ में साधु-साध्वियों को भी मिली विशेष प्रेरणा31.01.2026, शनिवार, कैराप, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :

छोटी खाटू में 162वां मर्यादा महोत्सव सम्पन्न के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युग प्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अब योगक्षेम वर्ष प्रवेश के लिए लाडनूं की ओर गतिमान हैं। इससे पूर्व आचार्यश्री डिडवाना भी पधारेंगे। उसके पूर्व शनिवार को प्रातःकाल शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना का कुशल नेतृत्व करते हुए बिंचावा से गतिमान हुए। मार्ग में अनेक लोगों को मंगल आशीष प्रदान करते हुए लगभग दस किलोमीटर का विहार कर महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी कैराप गांव में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि अहिंसा, संयम और तप महान धर्म है। आचार्यश्री भिक्षु ने धर्म जो दया के रूप में है, उसका विश्लेषण किया है। पाप आचरण से आत्मा की रक्षा करना लोकोत्तर अथवा आध्यात्मिक दया है। दया के संदर्भ में तीन दृष्टांत काम में लिया जा सकता है कि कैसे चोर चोरी का त्याग करती है तो उसकी आत्मा चोरी के पाप से बच जाती है और साथ में सेठ का धन भी बच जाता है। एक बकरे को मारने वाले कसाई को मुनिजी ने जीवों को मारने का त्याग कराया तो उसकी आत्मा का कल्याण हुआ और बकरों की जान भी बच गई  ।

दया की दृष्टि से ध्यान दिया जाए तो साधुओं ने जो भी प्रयास किया, चोरों की आत्मा को सुधारने का प्रयास किया। कसाई ने बकरा मारने का त्याग किया, वह लोकोत्तर दया का कार्य हो गया। साधुओं का उद्देश्य केवल आत्मा का कल्याण था तो सफलता भी प्राप्त हुई। मान लिया जाए कि चोरों ने चोरी का त्याग नहीं किया होता और कसाई ने बकरों को मारने का त्याग न किया होता तो भी साधुओं को अपने प्रयास का लाभ मिलता ही मिलता। इस संदर्भ में एक और दृष्टांत आता है कि एक बार परदार सेवन करने वाले व्यक्ति को साधुओं ने परदारसेवन व्यसन से मुक्ति का परित्याग कराया। इससे उस व्यक्ति की आत्मा तो सुधरी, लेकिन जो महिला थी, उसने उस आदमी पर आसक्त होने के कारण अपनी जान दे दी। ऐसे में बताया गया कि मूल चोर, कसाई और लंपट आदमी की आत्मा का कल्याण ही साधुओं का मूल लक्ष्य था। इसलिए साधुओं मूल कार्य तो आत्मकल्याण का ही होता है।आचार्यश्री भिक्षु के दृष्टांतों के साथ किसी रूप में मुनिश्री हेमराजजी स्वामी भी जुड़े रहे। आज उनका दीक्षा दिवस भी है। वे तेरापंथ धर्मसंघ के एकमात्र संत जिन्हें आचार्य ने शासन महास्तंभ का अलंकरण प्रदान किया। आज तीसरा चरण सुसम्पन्न हो रहा है।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के प्रसंग में हाजरी का वाचन करते हुए साधु-साध्वियों को प्रेरणा भी प्रदान की। तदुपरान्त आचार्यश्री की आज्ञा से मुनि हेमऋषिजी, मुनि मर्यादाकुमारजी, मुनि आर्षकुमारजी व मुनि मेघकुमारजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने मुनि हेमऋषिजी को 21 कल्याणक व अन्य तीन मुनिजी को एक-एक कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री की प्रेरणा से समुपस्थित ग्रामीण जनता ने सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति के संकल्प स्वीकार किए। आचार्यश्री के स्वागत में आदर्श कान्वेंट स्कूल की ओर से श्री गोविन्द राखेचा, श्री रूगाराम ढाका ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button