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गीतार्थता और गंभीरता का संतुलन हो तो हर परिस्थिति पर पाया जा सकता है नियंत्रण: पू. पद्मदर्शनसूरिजी

नवसारी। कंजीवाड़ी स्थित श्री आदिनाथ श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के नवनिर्मित उपाश्रय में जैनाचार्य पूज्य पद्मदर्शनसूरिजी महाराज सहित श्रमण भगवंतों का सामैयापूर्वक स्वागत किया गया। पूज्यश्री 19 फरवरी तक नवसारी के विभिन्न जैन संघों में स्थिरता कर प्रवचन प्रसादी प्रदान करेंगे।
इस अवसर पर सांढकुवा स्थित मानस अपार्टमेंट के बेसमेंट में पितांबरदास पानाचंद शाह परिवार के गृहांगन में “आचार्य पद के बढ़ामणा” का संगीतपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में गुरु भक्त उपस्थित रहे। पावन अवसर पर जैनाचार्य पू. पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि तीर्थंकरों की अनुपस्थिति में आचार्य भगवंत तीर्थंकर तुल्य होते हैं। जैन शासन के राजा के रूप में आचार्य ही धर्म की रक्षा करते हैं और जब-जब जैन शासन पर संकट आता है, तब आचार्य अडिग योद्धा बनकर सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि आचार्य पद केवल सम्मान का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और समझदारी का पद है। वर्तमान समय में परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं और उन्हें नियंत्रित करना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में गीतार्थता और गंभीरता का संतुलन ही हर चुनौती को संभालने की शक्ति देता है।
पूज्यश्री ने कहा कि सद्गुरु जब उचित समझते हैं, तब सुपात्र शिष्य पर शक्तिपात करते हैं, जो एक विरल घटना होती है। तकनीक के इस युग में सदाचार, शील और सात्विकता कम होती जा रही है। सदाचार के दीप बुझ रहे हैं, जिन्हें पुनः प्रज्वलित करने की आवश्यकता है। आचार ही सर्वोत्तम धर्म है और यदि समाज में आचार की प्रतिष्ठा नहीं होगी, तो राष्ट्र, संस्कृति, समाज और परिवारों को अपूरणीय क्षति उठानी पड़ेगी।
कार्यक्रम में मनसुखलाल शाह परिवार ने पूज्यश्री का अक्षत से बढ़ामणा कर आशीर्वाद लिया। कार्यक्रम के पश्चात उपस्थित श्रद्धालुओं को विशेष प्रभावना प्रदान की गई। साथ ही पूज्य मुनिश्री प्रीतदर्शनविजयजी महाराज के संयम जीवन के 25वें वर्ष में प्रवेश पर जैन संघ द्वारा शुभकामनाएँ भी दी गईं।

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