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गंता को गंतव्य तक पहुंचाने में मार्गदर्शक का बहुत महत्त्व : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-योगक्षेम वर्ष में आचार्यश्री ने प्रदान की पावन प्रेरणा-साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृतिसभा का हुआ आयोजन

21.02.2026, शनिवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) ।करीब 37 वर्षों बाद जैन विश्व भारती, लाडनूं में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में योगक्षेम वर्ष का मंगल शुभारम्भ हो गया है। शनिवार को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया।

शांतदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि पांच शब्द हैं- गंता, गंतव्य, गति, मार्ग व मार्गदर्शक। चलने वाला अथवा गमन करने वाला व्यक्ति गंता होता है। चलने वाला व्यक्ति को जहां पहुंचना है, जो लक्ष्य होता है, वह गंतव्य हो जाता है। गंता और गंतव्य के मिलन किए गंता को गति करनी होती है। गति होती है तो गंता और गंतव्य का मिलन हो सकेगा। प्रश्न हो सकता है कि गंता किधर करे? उत्तर दिया गया कि गंतव्य तक जाने के लिए गंता को निर्धारित मार्ग पर गति करनी होती है, किन्तु कौन-सा मार्ग गंतव्य तक ले जाएगा, इसके लिए मार्गदर्शक की अपेक्षा होती है। ये पांच चीजें मिलती हैं तो कोई गंता गंतव्य तक पहुंच सकता है।

अध्यात्म के संदर्भ में साधना करने वाला व्यक्ति गंता होता है। उसका गंतव्य मोक्ष होता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के मार्ग होता है और इस गति करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु इन पर गति करने के लिए कोई मार्गदर्शक होना चाहिए। मार्ग दिखाने वाले तीर्थंकर, गुरु व साधु मार्गदर्शक बनते हैं। मोक्ष जाने के लिए चार मार्ग बताए गए हैं। इस जीवन में सम्यक्त्व का भी बहुत महत्त्व है। सम्यक् दर्शन के बिना सम्यक् ज्ञान नहीं होता और ज्ञान के बिना सम्यक् चारित्र की प्राप्ति नहीं और चारित्र की प्राप्ति के बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं होती। इस संदर्भ में सम्यक्त्व के महत्त्व को जाना जा सकता है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि योगक्षेम वर्ष के दौरान जो प्राप्त नहीं है, उसे प्राप्त करने का अच्छा मौका है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने एक जिज्ञासा को अवसर प्रदान किया तो एक साध्वीजी ने अपनी जिज्ञासा की तो आचार्यश्री ने उन्हें समाधान प्रदान किया।आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में 20 फरवरी को लाडनूं में ही स्थित साध्वी सेवा मंदिर में दिवंगत हुई साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। इस अवसर पर मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने दिवंगत साध्वीजी के आत्मा के आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की।

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