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सनातन को सुदृढ़ करने वाले और नुकसान पहुंचाने वालों की पहचान अवश्य करें : स्वामी डॉ. राजेंद्र दास देवाचार्य

अंग्रेजी नव वर्ष जरुरत हो तो मनाएं, लेकिन हिन्दू नव वर्ष उत्साह के साथ अवश्य मनाएं

वीआईपी रोड वेसू स्थित श्री कामधेनु मंडपम में आयोजित कथा में महाराज ने सनातन संस्कृति और राष्ट्रबोध पर दिया प्रेरक संदेश

प्राचीन, ऐतिहासिक, आस्तिक-धार्मिक एवं औद्योगिक नगरी सूरत के वीआईपी रोड, वेसू स्थित श्री कामधेनु मंडपम में श्री जड़खोर गोधाम गौशाला में सेवित गोवंश के संरक्षण एवं सेवा के पावन उद्देश्य से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी श्रद्धालु सहभागिता कर रहे हैं। कथा के माध्यम से श्रद्धालु ज्ञानगंगा में गोता लगाकर भक्ति और वैराग्य से सराबोर हो रहे हैं। इस पुण्य आयोजन के मनोरथी श्रीमती गीतादेवी गजानंद कंसल एवं कंसल परिवार हैं। इस अवसर पर राकेश कंसल एवं प्रमोद कंसल ने परिवारजनों के साथ विधिवत व्यासपूजन किया।

कथा के छठे दिन व्यासपीठ से परम गौ उपासक, करुणामय, वेदज्ञ एवं निर्मल हृदय अनंत श्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य अग्र पीठाधीश्वर एवं मलूक पीठाधीश्वर स्वामी डॉ. श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज (श्री रैवासा-वृंदावन धाम) ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 22वें अध्याय में वर्णित चीरहरण लीला का अत्यंत भावपूर्ण एवं सारगर्भित वर्णन किया। इस दौरान “कनक भवन दरवाजे बढ़े रहो, जहां सियाराम विराजे पड़े रहो…” जैसे भजनों पर पूरा पंडाल भक्तिरस से ओत-प्रोत हो उठा और श्रद्धालु भावविभोर होकर भक्ति में लीन दिखाई दिए।

महाराजजी ने अपने प्रवचन में कहा कि चीरहरण लीला के समय भगवान श्रीकृष्ण मात्र छह वर्ष के कुमार थे और गोपियां चार-पांच वर्ष की कुमारिकाएं थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी कार्य या व्यवसाय गलत नहीं होता, किंतु उसका दुरुपयोग अधर्म है और अधर्म का फल भोगना ही पड़ता है। उन्होंने चित्रकारों द्वारा भगवान की लीलाओं के अशोभनीय चित्रण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देवी-देवताओं के चित्र ऐसे होने चाहिए, जिन्हें देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो जाएं।

उन्होंने कहा कि कुछ गैर-जिम्मेदार चित्रकार हमारे हिन्दू देवी-देवताओं के स्वरूप को अशोभनीय और अश्लील रूप में प्रस्तुत कर देते हैं, जो अत्यंत पीड़ादायक है। महाराजजी ने कहा कि हिन्दू समाज में अक्सर भूलने की प्रवृत्ति देखी जाती है और शत्रुबोध का अभाव रहता है। उन्होंने आग्रह किया कि सभी के प्रति भक्तिभाव अवश्य रखें, लेकिन इतना विवेक भी बनाए रखें कि सनातन धर्म को सुदृढ़ करने वाला कौन है और उसे नुकसान पहुंचाने वाला कौन। यह बोध यदि समाज में रहेगा, तभी हमारा सनातन धर्म और राष्ट्र सुरक्षित रह सकेंगे।

महाराजजी ने बंकिम चंद्र चटर्जी का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासनकाल में उनके द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ ने जनमानस में राष्ट्रभावना का संचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोग अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर होने लगे। उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आज दुर्भाग्यवश देश में रहने वाले कुछ लोग देश का अन्न ग्रहण करते हैं और सरकार की सभी सुविधाओं का अग्रिम पंक्ति में रहकर लाभ उठाते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ कहने से परहेज करते हैं।

महाराजजी ने कहा कि अंग्रेजी नववर्ष मनाना गलत नहीं है, लेकिन सनातन हिन्दू नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय के साथ मनाया जाना चाहिए। इस दिन मंदिर दर्शन, कुलदेवी-देवताओं का पूजन, पंचांग पूजन, माता-पिता एवं बड़ों का सम्मान और बच्चों को सनातन परंपराओं से परिचित कराना चाहिए। उन्होंने आग्रह किया कि सभी सनातनी हिन्दू अपने बच्चों को हिंदी महीनों, ऋतुओं, तिथि और पक्ष का ज्ञान दें तथा वैदिक परंपराओं के अनुसार संस्कारों का पालन करें, तभी सनातन संस्कृति और राष्ट्र सुरक्षित रहेंगे।

मनोरथी परिवार के राकेश कंसल एवं प्रमोद कंसल ने बताया कि कुंज पंसारी, कमल जैन (शालू ग्रुप), ओम प्रकाश झुनझुनवाला, विरेन्द्र सतनाली. रमेश चोकडिका, संजय अग्रवाल, सुरेश सतनाली, प्रमोद सतनाली, नरनारायण जालान, महेश मित्तल (सीए) आदि ने महाराजजी का अभिवादन कर आशीर्वाद लिया।

मीडिया प्रभारी सज्जन महर्षि ने बताया कि श्री जड़खोर सेवा समिति के समर्पित कार्यकर्ता भंवरलाल ढाका, जेठाराम ढाका, बनवारी मूंदड़ा, रामदेव दिवाकर, अंशुमन शर्मा, रामावतार गुर्जर, शुभम शर्मा, राजेश मिश्रा, नेमीचंद शर्मा, सज्जन शर्मा, शिवजी चौधरी, शिवकुमार चांडक, स्वरुप सिंह राजपुरोहित, किशन इन्दोरिया, सुनिल शर्मा, मुकेश रांकावत, देवीलाल राजपुरोहित, पवन रुंथला आदि तुलादान कार्यालय सहभागिता, दानपात्र में नियमित अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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