अहमदबादराजस्थानसामाजिक/ धार्मिकसूरत सिटी

-श्रेय और हितकर बातों का करें समाचरण : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-आचार्यश्री के दर्शनार्थ पहुंचे हरियाणा व पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाबचंद कटारिया

बनास नदी के तट पर अध्यात्म की गंगा बहा गतिमान हुए ज्योतिचरण 🌸

-11 कि.मी. का विहार कर शांतिदूत का कांकरोली में मंगल पदार्पण-श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य का किया भावभीना अभिनंदन

-कांकरोली की विधायक ने भी आचार्यश्री के स्वागत में दी भावनाओं को अभिव्यक्ति

-साध्वीप्रमुखाजी ने जनता को किया संबोधित-स्थानीय जनता ने भी दी भावनाओं को दी प्रस्तुति

30.11.2025, रविवार, कांकरोली, राजसमंद (राजस्थान) :बनास नदी के तट पर स्थित नाथद्वारा में अध्यात्म की गंगा प्रवाहित करने के उपरान्त रविवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना के साथ अगले गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। नाथद्वारावासी श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के प्रति अपने कृतज्ञ भाव अर्पित किए। श्रद्धालुओं को मंगल आशीष प्रदान करते हुए गतिमान हुए। आचार्यश्री के नाथद्वारा से विहार करने से पूर्व हरियाणा व पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाबचंद कटारिया पूज्य सन्निधि में उपस्थित हुए। राज्यपाल महोदय ने आचार्यश्री से मंगल आशीष किया। आचार्यश्री का उनके साथ संक्षिप्त वार्तालाप का क्रम भी रहा।

आचार्यश्री महाश्रमणजी आज कांकरोली की ओर गतिमान थे। कांकरोलीवासी अपने आराध्य की अभिवंदना के उत्सुक दिखाई दे रहे थे। उत्साही श्रद्धालु दूर-दूर तक मार्ग में पहुंचकर अपने आराध्य के चरणों का अनुगमन कर रहे थे। लगभग 11 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री महाश्रमणजी जैसे ही कांकरोली की सीमा में पधारे बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य का भावभीना स्वागत किया। श्रद्धालुओं के जयघोष से पूरा वातावरण गुंजायमान हो रहा था। उपस्थित जन समूह स्वागत जुलूस के रूप में मानवता के मसीहा की अभिवंदना कर रहा था। दर्शनार्थियों पर दोनों कर कमलों से आशीष वृष्टि करते हुए आचार्यश्री कांकरोली में स्थित प्रज्ञा विहार में पधारे।

प्रज्ञा विहार परिसर में ही बने विशाल प्रवचन पण्डाल पूरी तरह जनाकीर्ण बना हुआ था। उपस्थित जन समूह को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी सुनकर कल्याण को जान लेता है और सुनकर पाप को भी जान लेता है। कल्याण और पाप दोनों सुनकर जानने के बाद विशेष बात यह होती है कि जो श्रेय और हितकर हो, उसका समाचरण करने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य के पांच इन्द्रियां होती हैं। इन पांच इन्द्रियों के द्वारा आदमी ज्ञान करता है। ये पांच इन्द्रियां ज्ञानेन्द्रियां कहलाती हैं। इन ज्ञानेन्द्रियों से भोग भी हो सकता है। श्रोत्रेन्द्रिय और चक्षुरेन्द्रिय बाहर से ज्ञान ग्रहण करने में सक्षम सहायक साधन बनती हैं। प्रवचन के श्रवण से भी ज्ञान की वृद्धि हो सकती है। किसी से बात करें, उससे भी ज्ञान की वृद्धि हो सकती है। शिक्षक विद्यालय, महाविद्यालय में बोलकर ही ज्ञान प्रदान करते हैं। अच्छी बातों के श्रवण से कान धन्य हो जाते हैं। किसी दुःखी व्यक्ति की व्यथा आदि को सुन लें तो भी सामने वाले को राहत मिल सकता है। कान में कुण्डल धारण कर लेना तो बाह्य शोभा है। श्रोत्र अर्थात् ज्ञान से आदमी ज्ञान की बात सुने, आगम, धर्म, अध्यात्म का ज्ञान सुने। आदमी को अपने कानों से अच्छी बातों को, अच्छे ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।

परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु स्वामी के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष का प्रसंग भी चल रहा है। आचार्यश्री भिक्षु के साहित्य को पढ़े तो कितनों का कल्याण हो सकता है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज कांकरोली पहुंच गए हैं। जहां हमारे रत्नाधिक मुनिश्री सुरेशकुमारजी स्वामी से चार चतुर्मास के बाद मिलना हुआ है। आपका कुछ अच्छा क्रम बना रहे। यहां के लोगों में खूब धार्मिक चेतना बनी रहे।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने कांकरोलीवासियों को मंगल उद्बोधन प्रदान किया। स्थानीय स्वागताध्यक्ष श्री ललित बाफना व समारोह अध्यक्ष श्री विनोद बाफना ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। बालक विदांशु धारीवाल ने आचार्यश्री से अठाई की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। मुनि कैवल्यकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भावपूर्ण प्रस्तुति दी। मुनि संबोधकुमारजी मेधांश ने भी आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। कांकरोली की समस्त तेरापंथी संस्थाओं ने समूह रूप गीत का संगान किया। चार चतुर्मास के उपरान्त गुरु सन्निधि में पहुंचे मुनिश्री सुरेशकुमारजी ने भी अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित स्थानीय विधायक श्रीमती दिप्तीकिरण माहेश्वरी ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी तथा आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। मुनि संबोधकुमारजी की प्रथम उपन्यास ‘मत्स्योदर’ का लोकार्पण जैन विश्व भारती द्वारा किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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