राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

धन ही नहीं, धर्म की कमाई हो प्रयास : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-वर्ष 2025 के अंतिम दिवस आचार्यश्री ने राग-द्वेष से बचने को किया अभिप्रेरित

 -करीब 15 कि.मी. का विहार कर शांतिदूत पहुंचे झूंठा गांव-पाली जिले को पावन बना ब्यावर जिले आचार्यश्री ने किया मंगल प्रवेश

-श्री पार्श्वनार्थ चिंतामणि मंदिर पूज्यचरणों से बना पावन

31.12.2025, बुधवार, झूंठा, ब्यावर (राजस्थान) :सर्दी के मौसम में जहां लोग अपने घरों में दुबकने को विवश हैं, वहीं मानवता के कल्याण के लिए, जन-जन में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति जैसे गुणों का प्रसार करने के लिए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी निरंतर गतिमान हैं। बुधवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ चण्डावल से गतिमान हुए। सुबह की गुनगुनी धूप लोगों को सर्दी से राहत प्रदान कर रही थी।

पाली जिले के बाद अब युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों से ब्यावर की धरा पावनता को प्राप्त हो रही है। मार्ग में अनेक स्थानों पर ग्रामीण जनता ने आचार्यश्री का दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण लगभग 15 कि.मी. का प्रलम्ब यात्रा कर भक्तों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए ब्यावर जिले के झूंठा गांव में स्थित श्री पार्श्वनाथ चिंतामणि मंदिर परिसर में पहुंचे तब तक दोपहर के एक बजने वाले थे। आचार्यश्री का अथक परिश्रम श्रद्धालुओं को प्रणत बना रहा था। इतना विहार और इतने विलम्ब के बावजूद भी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी नित्य की भांति मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए शीघ्र ही पधार गए।

मंदिर परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि राग और द्वेष कर्म के बीज होते हैं। पाप कर्म के लगने में राग-द्वेष की बड़ी भूमिका होती है। वीतराग पुरुष राग-द्वेष से उपरत हो जाते हैं। सामान्य प्राणी राग-द्वेष से युक्त होता है। वह कभी राग के कारण अपराध कर लेता है तो कभी वह द्वेष के कारण भी दोष सेवन व अपराध का कार्य कर लेता है।

सन् 2025 की सम्पन्नता निकट आ रही है। वर्ष शुरु होता है और समय पर सम्पन्न भी हो जाता है। एक-एक वर्ष जा रहा है। इसलिए आदमी को यह विचार करना चाहिए कि राग-द्वेष से बचने का प्रयास बच सकें। आदमी अपने जीवन में धन की कमाई कितना भी कर ले, लेकिन वह आगे साथ जाने वाली नहीं होती। आदमी के साथ आगे के भव में उसके द्वारा किया हुआ धर्म जाने वाला होता है। इसलिए आदमी को धार्मिक बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को धन के साथ-साथ धर्म की कमाई का भी प्रयास करना चाहिए।

आदमी यह विचार कि यह वर्ष बीतने वाला है तो इस वर्ष में मैंने अपने धर्म की कमाई को कितना बढ़ाया। यदि नहीं पढ़ा पाया हो तो आगे प्रारम्भ होने वाले वर्ष में धर्म की कमाई पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए और जागरूकता के साथ धर्म की कमाई करने का प्रयास करना चाहिए। हमारे श्रावक प्रयास करें कि प्रतिदिन एक सामायिक हो जाए, महीने में एक-दो उपवास भी हो जाए। स्वाध्याय, ध्यान तथा दूसरों की आध्यात्मिक सेवा हो सके, ऐसा प्रयास करना चाहिए। जिस तरह आदमी पैसों का हिसाब-किताब करता है, उसी तरह आदमी को धर्म का भी हिसाब-किताब करना चाहिए कि कहीं कोई इस वर्ष में बड़ा पाप तो नहीं किया। बड़े पाप हो भी गए तो तो आदमी को उसके शुद्धिकरण प्रायश्चित के द्वारा करने का प्रयास किया जा सकता है। पापों से बचने से आदमी को राग-द्वेष रूपी कर्म के बीजों से बचने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा अमर है, इसलिए आदमी को अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। इसलिए आदमी आगामी वर्ष में जितना संभव हो सके, धर्म-ध्यान करने का प्रयास करे, यह काम्य है।आचार्यश्री के स्वागत में जैन संघ अध्यक्ष श्री पारसमल गादिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री मुकनचंद बोहरा आदि ने गीत को प्रस्तुति दी।

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