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ज्ञान के साथ बच्चों में हो संस्कारों का विकास : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

-स्वामीनारायण इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग में हुआ पावन प्रवास,स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों ने भी आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन

-लगभग 14 कि.मी. का विहार कर शांतिदूत पहुंचे ताजपुर

08.11.2025, शनिवार, ताजपुर, गांधीनगर (गुजरात) :जन-जन के मानस को आध्यात्मिक सिंचन प्रदान करने वाले, अपने चरणों से गुजरात की धरा को पावन बनाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अब धीरे-धीरे गुजरात की धरा से राजस्थान की ओर बढ़ रहे हैं। शनिवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में चिलोड़ा स्थित चन्द्रप्रभ लब्धि धाम से गतिमान हुए। मार्ग में आने वाले श्रद्धालुओं को मंगल आशीष प्रदान करते हुए लगभग चौदह किलोमीटर का विहार कर ताजपुर में स्थित स्वामीनारायण इंस्टिट्यूट ऑफ नर्सिंग मंे पधारे। इस संस्थान से जुड़े पदाधिकारियों व स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया।

महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित श्रद्धालु जनता व विद्यालय से जुड़े विद्यार्थियों को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि चार शब्द हैं- ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप। ज्ञान के माध्यम से आदमी पदार्थों को जानता है, दर्शन से श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्मों के आगमन को रोकता है और तप से आत्मा को शोधन करता है। ज्ञान एक पवित्र तत्त्व है। चेतना में अनंत ज्ञान स्वाभाविक रूप में है, किन्तु वह सारा ज्ञान प्रकट नहीं होता है। सामान्य आदमी का थोड़ा बहुत ज्ञान उजागर होता है, शेष ज्ञान आवृत्त रहता है। ज्ञान अध्यात्म विद्या का भी होता है और लौकिक विद्याओं का भी ज्ञान होता है। आज कितने-कितने स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि-आदि विद्या के संस्थान संचालित होते हैं। जहां कितने-कितने विद्यार्थी पढ़ते हैं, शिक्षक, प्रशिक्षक पढ़ाते हैं, विभिन्न विषयों का शोध कराते हैं, ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। भूगोल, खगोल, विज्ञान, गणित, आदि-आदि लौकिक विद्याओं का ज्ञान होता है। कितनी-कितनी भाषाओं की शिक्षा भी दी जाती होगी। इस ज्ञान का भी अपना महत्त्व है। इसके साथ-साथ विद्यार्थियों को यदा-कदा अध्यात्म विद्या का ज्ञान भी प्रदान करने का प्रयास होना चाहिए।

विद्यार्थियों में आध्यात्मिकता का विकास हो सके। अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी आदि अच्छे तत्त्वों का संस्कार उनमें उभर सके और उसके साथ कुछ ध्यान, योग, मेडिटेशन आदि भी कराया जाए तो संभव है विद्यार्थियों में चारित्रिक विकास भी हो सकता है। भूगोल-खगोल आदि का ज्ञान एकपक्षीय होता है। संस्कार का ज्ञान भी साथ होता है तो बराबरी की बात हो सकती है। लौकिक शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी जानी चाहिए। जो संस्थान धार्मिक उपक्रमों से जुड़े हुए हैं, वहां तो संभावना और आशा की जा सकती है कि अच्छे संस्कारों की बात हो सकती है। अध्यात्म विद्या का अच्छा ज्ञान हो जाए तो बच्चों में अच्छे संस्कारों का भी विकास हो सकता है।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज यहां आना हो गया है और बाबाजी से मिलना भी हो गया है। संतों के पास संतों का आना और सत्संग का होना बड़ा ही सुखदायक होता है। आचार्यश्री ने इस संदर्भित गीत का आंशिक संगान भी किया। स्वामीनारायण संप्रदाय के संत प्रेमस्वरूप स्वामी ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।

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