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धर्म ध्यान से बुढ़ापे को बनाएं स्वर्णिम: आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा.

11 सितम्बर 2025, अवध संगरीला, बलेश्वर, सूरत।
‘‘भगवान महावीर ने भी कर्म बंधन के कारण अनेक भवों में जन्म लिया कभी तिर्यंच तो कभी पशु-पक्षी बने, कभी मनुष्य बने और मनुष्य भव में अपने कर्मों को निर्जरित कर मोक्ष को प्राप्त हुए, इसलिए कर्म किसी को नहीं छोड़ता। व्यक्ति यह चिंतन करे कि जब मनुष्य जन्म मिला है तो इस शरीर के द्वारा अपने पुराने कर्मों को क्षय करते हुए अब नये कर्मों का बंधन नहीं करूं।’’ उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाए।
आचार्य भगवन ने वृद्ध अवस्था को स्वर्णिम बनाने की प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि पके हुए आम की खूशबू सभी को अच्छी लगती है, पका हुआ आम इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि वह मीठा होता है। उसी तरह वृद्ध अवस्था पके हुए फल की तरह है। वृद्ध अवस्था को स्वर्णिम बनाने के लिए शरीर शुद्धि की साधना करें, शरीर को कमजोर नहीं बनाएं। जब तक शरीर में ताकत है प्रतिदिन जितना संभव हो सके प्रातः काल भ्रमण करें। सुबह की सैर, आसन प्राणायाम, ध्यान, मनोगुप्ति की साधना करंे। व्यापार व्यवसाय में एक ट्रस्टी की तरह रहें, अधिक आसक्ति नहीं रखें तो व्यक्ति अपने बुढ़ापे को स्वर्णिम बना सकता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि धर्म आराधना करने वाले के भीतर स्वतः ही प्रेरणा जगती है। भगवान महावीर के 1 लाख 59 हजार श्रावकों में से 10 श्रावकों का वर्णन श्री उपासकदशांग सूत्र में आता है जिसमें उन्होंने धन, ऐश्वर्य, सम्पदा, पद प्रतिष्ठा, राज पाठ आदि का वृद्धावस्था में त्याग कर पौषध शाला में जाकर अंतःकरण से शुद्ध धर्म का पालन किया।
उन्होंने साधु एवं श्रावकों के मनोरथ की चर्चा करते हुए फरमाया कि साधु के तीन मनोरथ में पहला नया-नया ज्ञान सीखूं, दूसरा एकत्व एवं एकांत की साधना करूं, तीसरा अंतिम संथारा समाधि मरण करूं। उसी तरह श्रावक के भी तीन मनोरथ हैं – पहला आरंभ परिग्रह से मुक्त होऊ, दूसरा पांच महाव्रत धारण कर साधु बनूं और तीसरा अंतिम संथारा समाधि मरण करूंगा। इनमें साधु और श्रावक का तीसरा और अंतिम मनोरथ समान है। इस भव में प्रत्येक जीव का अंतिम लक्ष्य संथारा समाधि मरण का हो। जिसने संथारा ग्रहण कर लिया उसके भव सीमित हो जाते हैं, जन्म-मरण कम हो जाते हैं।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उदबोधन में फरमाया कि व्यक्ति मन के द्वारा कार्मण काया का बंधन करता है, मन छोटे बच्चे की भांति चंचल होता है, मन को नियंत्रित करने के लिए तीन गुप्ति की साधना करनी चाहिए।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘प्रभु के भजन से, नाम के रटन से, मिले सुख भारी हो, मंगलकारी हो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुत किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने संसार के आकर्षण को संसार भ्रमण का कारण बताया।
संवत्सरी महापर्व के बाद से ही निरंतर अनेक क्षेत्रों के संघ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हो रहे हैं। आज बैंगलोर के राजाजी नगर से 30 व्यक्तियों का संघ एवं महाराष्ट्र के जालना से 40 व्यक्तियों का संघ आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित हुआ।
राजाजी नगर बैंगलोर श्रीसंघ के अध्यक्ष श्री प्रकाशचन्द चाणोदिया, मंत्री श्री नेमीचन्द दलाल, श्री पारस लोढ़ा, श्रीमती रतनी बाई मेहता आदि ने अपनी भावनाएं व्यक्त की, इनका शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शॉल, माला द्वारा स्वागत-सम्मान किया गया।

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