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गुरु सूर्य के समान होते हैं – मुनि अजित सागर महाराज

गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर भावप्रवण प्रवचन

सूरत। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर आयोजित विशेष प्रवचन में जैन मुनि श्री अजित सागर महाराज ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि “गुरु सूर्य के समान होते हैं, जो मोह, अज्ञान और काम रूपी अंधकार को मिटा देते हैं।” उन्होंने कहा कि अहंकार और अंधकार जीवन के अर्थ को व्यर्थ कर देते हैं, जबकि गुरु रूपी दीपक के प्रकाश में जीवन सार्थक बन जाता है।

मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ के चरणों से जुड़कर ही परमात्मा पद को प्राप्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि “गुरु का अर्थ ‘भारी’ भी होता है — जो जीवन को आभारी बना देता है। गुरु चरणों में समर्पण ही सच्ची उन्नति का मार्ग है।”

इस अवसर पर ऐलक श्री विवेकानंद सागर महाराज ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “गुरु की शरण इत्र के समान होती है — यदि कुछ नहीं भी मिले तो भी जीवन सुगंधित हो जाता है।” उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा वह शुभ अवसर है, जब हम अपने जीवन में गुरु को पाने की कामना के साथ उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि “गुरु पूर्णिमा एक पूर्ण मां की तरह होती है, जो पोषण करती है, पुष्ट करती है, और हमें आत्मिक रूप से समृद्ध बनाती है। आशा है कि हम सभी का जीवन गुरु से जुड़कर और अधिक शांत, सार्थक और ऊर्जावान बने।”

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और प्रवचनों का लाभ लिया।

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