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भौतिकता पर आध्यात्मिकता का रहे अंकुश : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

10 कि.मी. का विहार कर गडादर में पधारे शांतिदूत -भगवान महावीर के दीक्षा दिवस पर आचार्यश्री ने अर्पित की विनयांजलि

-विद्यालय प्रबन्धन से जुड़े लोगों ने आचार्यश्री का किया अभिनंदन

14.11.2025, शुक्रवार, गडादर, साबरकांठा (गुजरात) :सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी गुजरात से राजस्थान की ओर गतिमान हैं। जैसे-जैसे राजस्थान की सीमा निकट आती जा रही है, पहाड़ियों के यत्र-तत्र दिखाई देने का क्रम भी प्रारम्भ हो गया है। आचार्यश्री की आगामी यात्रा व एक वर्ष से अधिक समय तक प्रवास राजस्थान में ही होना निर्धारित है। राजस्थान व गुजरात सीमा से सटे क्षेत्रों से लोगों के आने का क्रम भी प्रारम्भ है।

शुक्रवार को प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने राजेन्द्रनगर से मंगल प्रस्थान किया। उत्तर भारत में ठंड ने अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ कर दिया है, किन्तु इन क्षेत्रों में अभी ठंड की उतनी अधिकता देखने को नहीं मिल रही है। जन-जन को आशीष प्रदान करते हुए लगभग दस किलोमीटर का विहार परिसम्पन्न कर महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी गडादर में स्थित श्री गडादर प्राथमिकशाला में पधारे।

प्राथमिकशाला परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन मंे उपस्थित जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज मृगशिर कृष्णा दशमी का दिन है। आज परम वंदनीय श्रमण भगवान महावीर का दीक्षा दिवस है। चैत्र शुक्ला त्रयोदशी भगवान महावीर का जन्म, आज की तिथि दीक्षा की तिथि और कार्तिकी अमावस्या परिनिर्वाण की तिथि है। आज का दिन मानों पराक्रम का दिन है। जन्म लेना एक बात होती है, जीवन में पराक्रम करना विशेष बात होती है। कहा गया है कि तप और संयम में पराक्रम करना चाहिए। जन्म लेना सामान्य बात हो सकती है, किन्तु दीक्षा लेना विशेष बात होती है। भगवान महावीर ने आज के दिन साधुत्व को स्वीकार किया था।

भगवान महावीर ने अपने युवावस्था में करीब तीस वर्ष की अवस्था में संयम का संकल्प स्वीकार किया। वह दीक्षा की परंपरा जैन शासन में चल रही है। पूरे जैन समाज में दीक्षाओं का क्रम चलता ही रहता है। जीवन में एक भौतिकता का मार्ग है तो एक आध्यात्मिकता का मार्ग है। जीवन में कोरी भौतिकता ही भौतिकता हो तो वह अशांति का कारण बन सकता है। इसलिए कहा गया है कि भौतिकता पर आध्यात्मिकता का अंकुश रहना चाहिए। भौतिकता हो, किन्तु उस पर आध्यात्मिकता का अंकुश होना बहुत आवश्यक है। जिस प्रकार आदमी वर्षा और धूप से बचने के लिए छाता का प्रयोग करता है, उसी प्रकार भौतिकता के चकाचौंध में भी आध्यात्मिकता के छाते से अवांछनीय भौतिकता से बचने का प्रयास करना चाहिए। हम सभी संयम की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि अर्हम्कुमारजी अंग्रेजी भाषा में अपनी प्रस्तुति दी। प्राथमिकशाला की ओर से श्री रामाभाई व श्री जसुभाई पटेल ने अपनी अभिव्यक्ति दी व आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

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