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प्रत्याख्यान का अर्थ है संकल्प-प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा.

सूरत।आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में चल रहे ऑनलाईन आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के अंतिम दिन नाशिक व कुप्पकलां केन्द्र में सहभागी साधकों व उपस्थित धर्म सभा को प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि मिथ्यात्व भरे संसार में स्थिरता बनी रहे। यह संकल्प रहे कि कहीं पर कुछ भी घटना हो अनुकूलता-प्रतिकूलता हो मैं अपने जीव में स्थित रहने का पराक्रम करूंगा, इस संकल्प से साधक निश्चित ही धर्माराधना में आगे बढ़ सकता है।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने प्रत्याख्यान के बारे में फरमाया कि जिसे जीव और अजीव का बोध है उसका पच्चक्खाण सुपच्चक्खाण है। जिसे जीव और अजीव का बोध नहीं है उसका पच्चक्खाण दुपच्चक्खाण है। दुपच्चक्खाण से पुण्य मिल सकता है, लेकिन कर्म नहीं कटते। प्रत्याख्यान का अर्थ संकल्प हैं। साधक का यह संकल्प हो कि मैं अपने कर्मों को निर्जरित करूं अर्थात अपने संचित कर्मों को काटूं। साधक जीव अजीव का भेद करके ही अपने कर्मों को निर्जरित कर सकता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि जिस साधक को जीव और अजीव का बोध नहीं होता है उसकी यात्रा संसार की यात्रा होती है। चाहे वह कितने ही धर्म की पालना कर रहा है। जिस साधक ने शरीर और जीवात्मा का भेद नहीं किया। मिथ्यात्वी व्यक्ति जड़ और जीव को एक मानता है। जो शरीर को महत्त्व देता है, जड़ शरीर की साता के लिए चिंतन करता है और उसी के लिए विषय जुटाता है और उन्हीं विषयों में भोग भोगता है, इस कारण इस संसार सागर से पार नहीं हुआ। व्यक्ति स्वयं का अवलोकन करे कि यदि उसकी पद, प्रतिष्ठा सब छूट जाए और छूटने के बाद यदि किसी भी पुद्गल का ध्यान नहीं आता है तो समझ लेना चाहिए कि उसके जीवन में सम्यक्त्व आ गया है। जो व्यक्ति इस ओर प्रयास करता है तो वह मोक्ष गति की ओर आगे बढ़ सकता है।

मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जो तू चाहे भव सागर से तिर जाना, हे मानव तू शुभ कर्मों को कर लेना’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया कि जो दोष लगे हैं उसकी निवृति का मार्ग त्याग है। आसक्ति, मोह को तोड़ने के लिए प्रत्याख्यान एक मार्ग है। जब त्याग करते हैं तो वीतराग पथ पर आगे बढ़ते हैं। भोग करते हैं तो संसार के मार्ग को बढ़ते हैं। त्याग चाहे राजमहल का हो या परिवार का हो, जो तीर्थंकर बने उन सभी ने त्याग किया।आज की सभा में चैन्नई, कोलकाता, दमतरी (छत्तीसगढ़) से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

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