आत्मा सदा है और रहेगी-आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा.

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने सम्बोधन में आत्मार्थी के विषय में बताते हुए फरमाया कि जो आत्मा को महत्त्व देने वाला है, आत्मा पर अटल श्रद्धा करता है, आत्मा में रमण करता है वह आत्मार्थी साधक होता है। आत्मा सदा है और रहेगी, आत्मा शरीर के कण-कण में स्थित है। एक जौहरी व्यक्ति ही हीरे की परख करता है उसी प्रकार एक आत्मार्थी ही आत्मा को पहचान सकता है।
आचार्य श्री जी ने आगे फरमाया कि व्यक्ति के मन में यह प्रश्न हो सकता है कि आत्मा के गुण प्रकट क्यों नहीं हुए। अनंत काल के मिथ्यात्व मोह के कारण आत्मा के गुण प्रकट नहीं हो पाते हैं, क्योंकि महत्त्व मिथ्यात्व को दिया है। इस पंचम काल में मनुष्य जन्म मिला है तो इसका उपयोग अपने मिथ्यात्व को तोड़ने में लगाएं और अपने कदम आत्मार्थी बनने की ओर बढ़ाएं।
आचार्य श्री जी ने फरमाया कि जो अरिहंत परमात्मा की वाणी मिली है उसे बार-बार सुने, भगवान की वाणी कहती है कि सुनना भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिन वचन को सुनना उस पर अनुरक्त हो जाना, जिन वचन को भावपूर्ण स्वीकार करना ही कर्म मल रहित होने का श्रेयस्कर मार्ग है। जिन वचन हमें संक्लेश से दूर करते हैं। जिन वचन को सुनकर ही व्यक्ति पाप और पुण्य को जानता है, सत्य और असत्य को जानता है, जो उसे अच्छे लगे उसे स्वीकार करता है। प्रभु यह नहीं कहते कि यही सत्य है यही करो प्रभु आदेश नहीं देते। प्रभु कहते हैं जो आपको सही लगे, प्रिय लगे उसे ग्रहण करें।
आचार्य भगवन ने यह भी फरमाया कि एक प्यासे व्यक्ति को जब प्यास लगती है तो वह कहीं भी जाकर पानी को ढूंढ लेता है और अपनी प्यास बुझा लेता है उसी प्रकार आत्मार्थी साधक संसार और वीतरागता के मार्ग को जान लेता है, और सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है और जो तीर्थंकरों ने मार्ग अपनाया उसी मार्ग पर आगे बढ़ता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि साधु वह है जो सदा उपशांत रहता है, शिक्षादाता जो गुरु है उन पर कुपित नहीं होता। जीवन में साधना करते समय अनेक परिस्थितियां आती है पर वह अपने मन और इन्द्रियों को स्थिर करता है। परिस्थितयां कैसी भी हो जो साधक सबमें जीव देखता है आत्मा की ओर अभिमुख हैं, मन और पांचों इन्द्रियों को वश में करता है, हर परिस्थिति में शांत रहता है, मन, वचन, काया को आत्मा की ओर जोड़ता है, पर चिंतन का गोपन कर आत्मा की ओर स्थिर हो जाता है, कष्ट होने पर आकुल व्याकुल नहीं होता, स्थिरता बनाए रखता है वह आत्मार्थी साधक होता है।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘हर सांस में हो सीमरण तेरा, यूं बीत जाए जीवन मेरा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज की प्रवचन सभा में मेरठ, हैदराबाद, फरीदाबाद, मुंबई आदि स्थानों से श्रद्धालु उपस्थित थे।




