अनाग्रही व निष्पक्ष को ही सच्चाई की प्राप्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
नवरात्र के संदर्भ में शांतिदूत की सन्निधि में प्रारम्भ हुआ आध्यात्मिक अनुष्ठान

लगभग आधे घण्टे तक आचार्यश्री के साथ श्रद्धालुओं ने किया मंत्रों का जप
-अमृतवाणी के वार्षिक अधिवेशन, शांतिदूत ने दी मंगल प्रेरणा
22.09.2025, सोमवार, कोबा, गांधीनगर (गुजरात) :सोमवार, आश्विन शुक्ला प्रतिपदा। शारदीय नवरात्र का प्रारम्भ। शक्ति की आराधना का सम्पूर्ण भारत वर्ष में आगाज। कहीं दुर्गादेवी की प्रतिमाओं की स्थापना तो घर-घर में घट की स्थापना का क्रम। गुजरात में गरबे की धूम। ऐसे सुअवसर पर गुजरात के अहमदाबाद के सन्निकट कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती परिसर में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ वर्तमान अधिशास्ता, सिद्ध साधक, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में भी नवरात्र के संदर्भ में आध्यात्मिक अनुष्ठान का प्रारम्भ हुआ।
वीर भिक्षु समवसरण में समुपस्थित जनता के मध्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी पधारे और नवरात्र के संदर्भ में आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम प्रारम्भ किया। आचार्यश्री के साथ उपस्थित जनमेदिनी मंगल मंत्रों का उच्चारण करते हुए जप किया। लगभग आधे घण्टे तक चले इस जप अनुष्ठान ने सम्पूर्ण वातावरण को मानों नवीन ऊर्जा से ऊर्जान्वित कर दिया। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि ‘आयारो’ आगम में कहा गया है कि जो आदमी मध्यस्थ होता है, अनाग्रही होता है, निष्पक्ष होता है, वह व्यक्ति सच्चाई की अच्छी आराधना करने में सफल हो सकता है। जहां पक्षपात, आग्रह का भाव आ गया, वहां आदमी सच्चाई से दूर रह सकता है। मध्यस्थ रूपी व्यक्ति का मन रूपी बछड़ा युक्ति रूपी गाय के पीछे चलता है, लेकिन जहां दुराग्रह का भाव आ गया, वह मन रूपी बछड़े को अपनी ओर खिंचने लगता है और युक्ति रूपी गाय से दूर ले जाता है। युक्ति संगत कोई बात हो, उसी का समर्थन होना चाहिए।

शहरी स्तर में सच्चाई का तो भले आग्रह हो सकता है, किन्तु दुराग्रह भाव का स्वीकरण नहीं होना चाहिए। सच्चाई के प्रति निष्ठा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। सच्चाई के प्रति निष्ठा रखने वाला व्यक्ति महान हो सकता है। मध्यस्थ भाव रखते हुए आदमी को अपनी प्रतिभा का सदुपयोग करने का प्रयास होना चाहिए। अनाग्रह भाव से किया गया चिंतन और निर्णय फलदायी हो सकता है।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज से नवरात्र का आध्यात्मिक अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ है। गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी जब विराजमान थे, तब से यह क्रम प्रारम्भ हुआ है। आदमी को इसके माध्यम से अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अमृतवाणी के वार्षिक अधिवेशन का मंचीय उपक्रम था। इस संदर्भ में अमृतवाणी के अध्यक्ष श्री ललित दुगड़ व मंत्री श्री अशोक पारख ने अपनी अभिव्यक्ति दी। अमृतवाणी के उपाध्यक्ष श्री पन्नालाल पुगलिया ने अमृतवाणी द्वारा आयोजित ‘स्वर संगम’ के ग्राण्ड फिनाले के संदर्भ में जानकारी दी। इस संदर्भ में युगप्रधान आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि परम पावन आचार्यश्री तुलसी के संदर्भ में हमारे धर्मसंघ में अनेक नवीन उन्मेष आए थे। जैन विश्व भारती में अमृतवाणी का बिल्डिंग है। अमृतवाणी मानों वाणी का खजाना है। हमारे गुरुओं की वाणियां सुरक्षित हैं। गुरुकुलवास में अमृतवाणी बारह ही महीने साथ चलता है। वर्तमान में बहुत ही शांति दृश्य, वाणी रूप में आयोजन संरक्षित किए जाते हैं। इस संस्था के द्वारा भी अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक कार्य होता रहे। डॉ. प्रेमसुख मरोठी ने अपनी पुस्तक ‘ब्रह्मकमल’ कविता संग्रह की पुस्तक आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित करते हुए अपनी भावाभिव्यक्ति दी। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।




