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आसो तेरस पर गूंजी दादागुरुदेव इकत्तीसा की गूंज

सूरत। आसो तेरस शुक्रवार के शुभ अवसर पर पूरे देशभर में दादागुरुदेव इकत्तीसा का सामूहिक पाठ भक्तिभाव से संपन्न हुआ। सूरत स्थित कुशल दर्शन दादावाड़ी, पर्वत पटिया में 108 बार अखंड पाठ का आयोजन किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्ति गीतों और आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान हो उठा।यह आयोजन केवल सूरत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर के दादावाड़ियों, उपाश्रयों, मंदिरों तथा गुरु भक्तों के घरों और कार्यालयों में भी इकत्तीसा पाठ की गूंज सुनाई दी। साधु-साध्वियों की प्रेरणा से गांव-गांव और शहर-शहर में इस चमत्कारी पाठ का आयोजन हुआ, जिससे हर स्थान पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ।

सूरत में चल रहे खरतरगच्छाचार्य संयम सारथी श्री जिन पीयूष सागर सूरीश्वर जी महाराज के सूरी मंत्र की पीठिका के दौरान उनके शिष्य पूज्य समर्पित सागरजी महाराज,शाश्वत सागरजी महाराज एवं प. पू. साध्वी श्री प्रमोदिता श्रीजी म.सा. आदि ने भी इस पाठ की महिमा का वर्णन किया, जिससे भक्तों की आस्था और प्रगाढ़ हुई।

गौरतलब है कि गुरु इकत्तीसा का इतिहास लगभग 74 वर्ष पुराना है। संवत 2008 में इसकी रचना गच्छाधिपति श्री पूज्य श्री जिनविजेंद्र सूरीजी म.सा. के भक्त गोपालजी द्वारा श्री जिनदत्तसूरि दादागुरुदेव की प्रेरणा से की गई थी। तभी से यह पाठ भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति का शक्तिशाली साधन माना जाता है।हजारों भक्तों ने अपने जीवन में इस पाठ को शामिल कर सुख-शांति, समृद्धि, स्वास्थ्य और पारिवारिक खुशियां प्राप्त की हैं। कई लोगों ने संकटों से मुक्ति और चमत्कारी अनुभव साझा किए हैं।

श्री जिनदत्तसूरि समाधिस्थल जीर्णोद्धार समिति, अजमेर के चम्पालाल बोथरा ने कहा कि “गुरुदेव इकत्तीसा केवल एक पाठ नहीं, बल्कि गहन आस्था, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। यह वह चमत्कार है, जिससे हर भक्त की सच्ची मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।”सूरत की हरिपुरा दादावाड़ी में भी श्रद्धालुओं ने इकत्तीसा पाठ का आयोजन किया। मान्यता है कि यहीं दादागुरुदेव ने अंधों को नेत्र प्रदान कर चमत्कार किया था। आयोजन के दौरान दादावाड़ी के छत्र अपने आप हिलने लगे, जिसे भक्तों ने चमत्कारिक अनुभूति बताया।यह अवसर श्रद्धा, भक्ति और मंगलमय जीवन का अद्वितीय वरदान सिद्ध हुआ।

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