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जीएसटी व आयकर विभाग से व्यापारी को नोटिस मिलते ही ‘सेटलमेंट’ के नाम पर खेल,

जीएसटी-आयकर रिटर्न के आंकड़ों के अंतर का फायदा उठाकर वसूली का गोरखधंधा

जीएसटी और आयकर रिटर्न में अंतर की नोटिस से घबराने की जरूरत नहीं, 31 दिसंबर तक सुधार का मिलता है अवसर

सूरत। वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद आयकर रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू होती है। इस दौरान कई मामलों में व्यापारी द्वारा दाखिल किए गए आयकर रिटर्न और जीएसटी रिटर्न में दर्ज कारोबार के आंकड़ों के बीच अंतर होने पर आयकर विभाग की ओर से नोटिस जारी किया जाता है। नोटिस मिलते ही कई व्यापारी घबरा जाते हैं और समाधान के लिए इधर-उधर दौड़ लगाने लगते हैं। इसी स्थिति का फायदा उठाकर कुछ तत्व व्यापारियों से ‘सेटलमेंट’ कराने के नाम पर रकम ऐंठने का गोरखधंधा कर रहे हैं। हालांकि, जानकारों के मुताबिक ऐसे मामलों में व्यापारी को घबराने के बजाय पहले अपने रिटर्न और आंकड़ों की जांच कर आवश्यक सुधार करना चाहिए।

केंद्र सरकार की विभिन्न राजस्व एजेंसियों, जैसे आयकर विभाग, जीएसटी विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, राजस्व खुफिया निदेशालय और सीमा शुल्क विभाग के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की व्यवस्था है। इसके तहत अलग-अलग विभागों के पास उपलब्ध करदाता से संबंधित आंकड़े साझा किए जाते हैं। इसी व्यवस्था के कारण व्यापारियों द्वारा हर महीने दाखिल किए जाने वाले जीएसटीआर-3बी रिटर्न की जानकारी आयकर विभाग तक भी पहुंचती है।

ऐसे में जब व्यापारी आयकर रिटर्न दाखिल करता है और उसमें दर्शाए गए कारोबार अथवा अन्य आंकड़े जीएसटी विभाग के रिकॉर्ड में उपलब्ध आंकड़ों से मेल नहीं खाते, तो कुछ मामलों में विभाग की ओर से नोटिस जारी किया जाता है। नोटिस मिलने के बाद व्यापारी को लगता है कि बड़ी कार्रवाई होने वाली है और इसी डर का फायदा कुछ लोग उठाते हैं। जानकारों का कहना है कि ऐसी स्थिति में किसी अनधिकृत व्यक्ति को पैसे देकर ‘सेटलमेंट’ कराने के बजाय पहले रिटर्न में मौजूद अंतर और उसके कारण की जांच करनी चाहिए।

गलती सुधारने के लिए व्यापारी को मिलता है पर्याप्त समय

जानकारों के अनुसार, जीएसटी में वार्षिक रिटर्न दाखिल करते समय व्यापारी को साल के दौरान हर महीने दाखिल किए गए जीएसटीआर-3बी रिटर्न में हुई गलतियों को सुधारने का अवसर मिलता है। आवश्यक सुधार करने के बाद वार्षिक जीएसटी रिटर्न दाखिल किया जाता है। इसके बाद वार्षिक रिटर्न में दर्ज आंकड़ों को आयकर रिटर्न में भी सही तरीके से दर्शाना जरूरी होता है।

आयकर रिटर्न में ऑडिट से जुड़े मामलों के लिए सामान्य तौर पर 31 अक्टूबर तक रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा होती है। हालांकि, यदि रिटर्न दाखिल करने के बाद उसमें कोई गलती या विसंगति रह जाती है, तो निर्धारित नियमों के अनुसार 31 दिसंबर तक संशोधित आयकर रिटर्न दाखिल कर उसमें सुधार करने का अवसर उपलब्ध रहता है।

जानकारों का कहना है कि जीएसटी और आयकर रिटर्न के आंकड़ों में अंतर होने के कारण यदि व्यापारी को नोटिस मिलता है, तो केवल नोटिस मिलने से घबराने की आवश्यकता नहीं है। सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जीएसटी और आयकर रिटर्न में आंकड़ों का अंतर क्यों है। यदि वास्तविक गलती है और नियमों के तहत संशोधन की सुविधा उपलब्ध है, तो समयसीमा के भीतर रिटर्न में आवश्यक सुधार किया जा सकता है।

इसलिए व्यापारियों को नोटिस मिलने के बाद किसी व्यक्ति के दबाव में आकर ‘सेटलमेंट’ के नाम पर पैसे देने के बजाय संबंधित विभाग की प्रक्रिया और अपने कर सलाहकार की मदद से मामले को समझना चाहिए। समय पर रिटर्न में आवश्यक सुधार करने से अनावश्यक परेशानी और गलत तरीके से पैसे ऐंठने वाले तत्वों से बचा जा सकता है।

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