
नई दिल्ली/सूरत: चेक बाउंस के मामलों को लेकर बैंकिंग और कानूनी स्तर पर सख्ती पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चेक अनादर केवल बैंकिंग त्रुटि नहीं, बल्कि कानून के तहत दंडनीय अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर भारी जुर्माना और जेल तक की सजा का प्रावधान है, इसलिए खाताधारकों और व्यापारियों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अनुसार यदि चेक अपर्याप्त राशि के कारण बाउंस होता है और नियमानुसार नोटिस व कानूनी प्रक्रिया के बाद मामला अदालत तक पहुंचता है, तो दोषी व्यक्ति को चेक की राशि के दोगुने तक आर्थिक दंड या अधिकतम दो वर्ष की कारावास की सजा हो सकती है। कई मामलों में अदालत दोनों दंड भी दे सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि चेक जारी करना एक कानूनी वचन की तरह माना जाता है, इसलिए बिना पर्याप्त राशि के चेक देना गंभीर अपराध माना जाता है।
बैंकिंग स्तर पर भी बार-बार चेक बाउंस होने पर खाताधारक को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे मामलों में खाते की गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जाती है और बैंक नई चेक बुक जारी करने से मना कर सकते हैं, ऋण या क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाओं पर रोक लगा सकते हैं या खाते को सीमित कर सकते हैं। हालांकि ऐसी कार्रवाई संबंधित बैंक की आंतरिक नीतियों पर निर्भर करती है।
लगातार चेक बाउंस होने से ग्राहक का क्रेडिट स्कोर भी प्रभावित होता है, जिससे भविष्य में गृह ऋण, वाहन ऋण या व्यवसायिक ऋण लेने में कठिनाई हो सकती है। खराब वित्तीय रिकॉर्ड कई वर्षों तक बना रहता है और उसे सुधारने में समय लगता है। व्यापारिक लेन-देन में चेक एक सामान्य माध्यम है, इसलिए इसका सबसे अधिक असर व्यापारियों और कंपनियों पर पड़ सकता है। बिना पर्याप्त राशि के चेक जारी करने से व्यापारिक प्रतिष्ठा को नुकसान, सप्लायर का भरोसा कम होना और कानूनी विवाद जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि चेक जारी करने से पहले खाते की शेष राशि अवश्य जांचें, जारी किए गए चेक का रिकॉर्ड रखें और बैंक स्टेटमेंट नियमित रूप से देखते रहें। यदि किसी कारणवश चेक बाउंस हो जाए तो संबंधित व्यक्ति से तुरंत संपर्क कर वैकल्पिक भुगतान करना चाहिए। उनका कहना है कि वित्तीय अनुशासन और सावधानी ही चेक बाउंस से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है।



