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मन की पवित्रता व एकाग्रता सुख प्रदान करने वाली : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-दशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के दीक्षा दिवस पर आचार्यश्री ने किया सादर स्मरण

-साध्वी मधुस्मिताजी आदि साध्वियों सहित छोटीखाटूवासियों ने दी अभिव्यक्ति

28.01.2026, बुधवार, छोटी खाटू, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, जनमानस को सन्मार्ग दिखाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में छोटी खाटू में विराज रहे हैं। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि प्राप्त कर छोटी खाटू नगरी मानों आध्यात्मिक नगरी बनी हुई है। वहीं मर्यादा महोत्सव के बाद भी भारत व प्रदेश के मंत्रियों के पहुंचने और अनेक आयोजनों के कारण मानों पूरी छोटी खाटू में मेले जैसा माहौल बना हुआ है।

बुधवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मर्यादा समवसरण में उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि मन को एक दुष्ट अश्व भी कहा गया है। मन को दुष्ट अश्व की उपमा इसलिए दी गई कि यह अनावश्यक कहां से कहां तक दौड़ता रहता है। यह कभी एकाग्र भी होता है, लेकिन इसमें चंचलता भी रहती है। मन की गति को बहुत द्रुत भी बताया गया है। आदमी शरीर से यहां बैठे-बैठे भी हजारों किलोमीटर दूर किसी विषय, वस्तु आदि तक पहुंच जाता है। सेकेण्डों के समय में मन से आदमी कहां से कहां पहुंच जाता है। इसलिए मन को दुष्ट अश्व की उपमा दी गई है।

मन की चंचल बनाने वाला आदमी का भाव होता है। कार्मण शरीर का प्रभाव, राग-द्वेष की वृत्तियां मन को चंचल बना देती हैं। राग-द्वेष के भाव कमजोर पड़ जाएं और वीतरागता का विकास हो जाए तो संभवतः मन की चंचलता भी कुछ कम हो सकती है। मन अच्छा अश्व भी बन सकता है। मन को पवित्र संकल्प व कल्याणकारी विचारों वाला हो, इसका प्रयास करना चाहिए। मन यदि पवित्र संकल्पों वाला हो जाए और मन एकाग्र हो जाए तो मन बहुत अच्छा बन सकता है, मन सुमन बन सकता है। मन की पवित्रता और एकाग्रता सुख प्रदान करने वाली होती है। श्रुत की लगाम से मन रूपी घोड़े को काबू में कर लिया जाए तो मन रूपी अश्व भी अच्छा बन सकता है।

आज परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का दीक्षा दिवस है। माघ शुक्ला दशमी को उन्होंने बाल्यावस्था में साधुत्व को स्वीकार किया और अंतिम श्वास तक संन्यास जीवन को पाल लिया। इसमें भी लम्बा जीवनकाल हो और कोई अखण्ड संयमित जीवन जी ले तो बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। आज के दिन एक बालक ने अन्य अनेक व्यक्तियों के साथ सरदारशहर में मुनि दीक्षा ली। उन्होंने इतना अध्ययन किया कि एक दार्शनिक मुनि के रूप में भी सामने आए। बाद में आगम कार्य से गहराई से जुड़ गए। आगम के अनुवाद आदि में उनका काफी योगदान रहा। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी प्रेक्षाध्यान भी कराते थे। उन्होंने कितने-कितने प्रेक्षाध्यान शिविरों का निर्देशन व सान्निध्य प्रदान किया। वे हमारे धर्मसंघ के दसवें अनुशास्ता थे। वि.सं. 2087 को उनके दीक्षा को सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे। वे ध्यान भी कराते थे। ध्यान की साधना भी मन को एकाग्र बनाने में सहयोगी बन सकती है।

अणुव्रत समिति-छोटी खाटू के अध्यक्ष श्री कपूरचंद बेताला ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अपने सहयोगियों के साथ अणुव्रत के संकल्प पत्र आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत की तो आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। श्री टीकमचंद सेठिया ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी मधुस्मिताजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। तेरापंथी सभा-विजयनगर, बेंगलुरु के अध्यक्ष श्री मंगलचंद कोचर ने गीत को प्रस्तुति दी। श्री प्रतीक लोढ़ा ने भी गीत को प्रस्तुति दी। श्रीमती सरला धारीवाल ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

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