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श्रीमद् भगवद् गीता धर्मग्रंथ नहीं, नैतिक विज्ञान है : अदालत

गीता पढ़ाने से कोई ट्रस्ट धार्मिक नहीं हो जाता

FCRA के तहत विदेशी फंडिंग रोकने का केंद्र का आदेश रद्द, पुनर्विचार के निर्देश
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि श्रीमद् भगवद् गीता को विदेशी अनुदान प्राप्त करने के उद्देश्य से FCRA (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) के तहत धार्मिक ग्रंथ नहीं माना जा सकता। इसलिए केवल गीता और योग का शिक्षण देने के आधार पर किसी ट्रस्ट को FCRA पंजीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन की एकल पीठ ने अर्श विद्या परंपरा ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह अपना पूर्व निर्णय रद्द करे और मामले पर पुनः विचार करे।
केंद्र सरकार ने ट्रस्ट को FCRA पंजीकरण देने से इनकार किया था। अदालत ने कहा कि केंद्र का यह अस्वीकृति आदेश अपर्याप्त तर्क और प्रक्रिया संबंधी खामियों पर आधारित है। हाईकोर्ट ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर इस मामले पर दोबारा विचार करे।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकार के पास विदेशी फंड ट्रांसफर से संबंधित कोई ठोस सबूत हों, तो वह ट्रस्ट को नई और विस्तृत नोटिस जारी कर सकती है।केंद्र सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि श्रीमद् भगवद् गीता कोई धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि नैतिक विज्ञान है। अदालत ने कहा कि वेदांत एक दार्शनिक प्रणाली है और योग शारीरिक एवं मानसिक कल्याण के लिए एक सार्वभौमिक अभ्यास है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि गीता, वेदांत या योग का शिक्षण देने से कोई संगठन स्वतः धार्मिक नहीं हो जाता। FCRA के संदर्भ में श्रीमद् भगवद् गीता को धार्मिक ग्रंथ मानने का कोई आधार नहीं है।

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