राजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

सत्य महाव्रत का निष्ठापूर्वक हो पालन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्यश्री ने किया हाजरी का वाचन

ह्यूस्टन से समागत समणीजी व कालू से पहुंची साध्वी उज्जवलरेखाजी दी भावाभिव्यक्तिआचार्यश्री से मंगल आशीष प्राप्त कर महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल के नए सत्र का शुभारम्भ01.04.2026, बुधवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :

तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी योगक्षेम वर्ष सम्पन्न कर रहे हैं। वर्ष भर चलने वाले इस महनीय वर्ष ने मानों तेरापंथ की राजधानी व जैन विश्व भारती परिसर को तीर्थ स्थान के रूप में परिवर्तित कर दिया है। जहां प्रत्येक दिन देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर अपने आराध्य की आराधना कर अपने जीवन को सफल बना रहे हैं। यह वर्ष चतुर्विध धर्मसंघ के लिए स्वर्णिम काल-सा बना हुआ है। गत कल महावीर जयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में उपस्थित थे।

बुधवार को प्रातःकाल मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पधारने से पूर्व आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती के अंतर्गत संचालित महाप्रज्ञ प्रोग्रेसिव स्कूल के नए शैक्षणिक सत्र के शुभारम्भ के संदर्भ में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शिक्षक व प्रबन्धन आदि कार्यों से जुड़े लोग पहुंचे। आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस प्रकार आचार्यश्री के मंगल आशीर्वाद से इस नवीन शैक्षणिक सत्र का शुभारम्भ हुआ।

तदुपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पधारे। नित्य की भांति साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु के पांच महाव्रत मानों रत्न के समान हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में ये पांचों महाव्रत रत्न के समान हैं। इनकी सुरक्षा का प्रयास करते रहना चाहिए। इनमें एक महाव्रत है-सत्य। ये पांचों महाव्रत अपने आप में संवर हैं। साधु को मृषावाद का त्याग कराया जाता है। सभी सच्ची बातें बताने वाली हों अथवा न हों, किन्तु साधु को सर्वमृषावाद का त्याग कराया जाता है। साधु को यह ध्यान देना चाहिए कि जहां तक संभव हो, मृषावाद से बचने का प्रयास करना चाहिए।

साधु को बोलना होता है तो सत्य ही बोलना होता है। सर्वमृषावाद से विरमण और बोलना तो सत्य ही बोलना साधु के लिए बहुत अच्छी बात हो सकती है। इसलिए साधु को अल्पभासी भी होना चाहिए। साधु अल्पभासी होता है अथवा मितभाषी होता है तो उसके सत्य महाव्रत की सुरक्षा हो सकती है। अधिक बोलने वाले को महाव्रत की पालना में कमी भी आ सकती है। इसलिए जहां तक संभव हो, मितभाषी बनने का प्रयास करना चाहिए। कोई बात कहनी भी है तो सोच-सोचकर बोलने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को विचारपूर्वक बोलने का प्रयास करना चाहिए। सत्य महाव्रत के प्रति निष्ठा हो जाए तो चारित्र और अधिक निर्मल हो सकता है। अयथार्थ से बचने का प्रयास करना चाहिए। सत्य महाव्रत साधुओं के लिए तो सत्य रूपी अणुव्रत गृहस्थों के लिए होती है। आम आदमी भी यदि सत्य का निष्ठा से पालन करे तो दुनिया कितनी अच्छी हो सकती है।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं। तदुपरान्त चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। ह्यूस्टन सेंटर से गुरु सन्निधि में पहुंची समणी आर्जवप्रज्ञाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित साध्वी उज्वलरेखाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने पूरे ग्रुप को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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