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कृतार्थ एवं अत्यंत सुखी आत्मा हैं भगवान महावीर : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

महातपस्वी महाश्रमण की मंगल सन्निधि में भगवान महावीर की जन्म जयंती का भव्य आयोजन

-आचार्यश्री ने भगवान महावीर व आचार्यश्री भिक्षु के जीवन की समानताओं को किया व्याख्यायित

-मुख्यमुनिश्री ने गीत का किया संगान, साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी ने दी अभिव्यक्ति-साध्वी पीयूषदर्शनाजी ने भी दी अभिव्यक्ति

31.03.2026, मंगलवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :जन-जन के मानस को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में मंगलवार को भगवान महावीर के जन्म जयंती भव्य रूप में समायोजित किया गया। मंगलवार को सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ की विराट उपस्थिति। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवृन्द ने प्रज्ञागीत का संगान किया। तदुपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने गीत का सुमधुर संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने महावीर जयंती के संदर्भ में अपनी विचाराभिव्यक्ति दी।

साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी उपस्थित जनता को अभिप्रेरित किया। आज के अवसर पर उपस्थित आचार्यश्री शिवमुनिजी की सुशिष्या साध्वी पीयूषदर्शनाजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जो वीतराग बन जाता है, वह इस जीवन के बाद सर्वदुःखमुक्त हो जाता है। इस प्रकार वह दीर्घकालीन कर्मरोग से भी आत्मा मुक्त हो जाती है और अत्यंत सुखी बन जाती है। भगवान महावीर एक कृतार्थ व अत्यंत सुखी आत्मा हैं।

आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी है। भगवान महावीर की 2625वीं जयंती है। इस जयंती पर जैन समाज में बहुत उत्साह और उल्लास भी देखने को मिलता है। उनका जीवन हमें आगम वाङ्मय से भी प्राप्त होता है। भगवान महावीर के जीवन जीने के क्रम, उनकी साधना, उनकी तपस्या आदि को देखें तो उनके तपस्या के दिन ही ज्यादा मिलेंगे। उन्होंने साधना के लिए मानों स्वयं को समर्पित कर दिया। वे जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर हुए। उनका उपदेश तो मानों सम्पूर्ण मानव जाति के लिए उपयोगी हो सकते हैं, समस्या का समाधान प्रदान करने वाले हो सकते हैं। दुनिया में अभी युद्ध की स्थिति बनी हुई है। महावीर जयंती पर भगवान महावीर का अहिंसा का संदेश ऐसे राष्ट्र या राष्ट्राध्यक्षों के पास किसी रूप में पहुंचें तो अहिंसायुक्त चिंतन हो, जिससे हिंसा को विराम मिले।

जहां हिंसा होती है, वहां दुःख पैदा हो जाते हैं और वहां विकास में भी बाधा उत्पन्न हो जाती है। विकास के लिए अहिंसा व शांति की अपेक्षा होती है। दुनिया में हर जगह शांति की बारिश हो। परम पूज्य गुरुदेव तुलसी की इस जन्मभूमि में मुझे कितने वर्षों बाद भगवान महावीर की जन्म जयंती को मनाने का अवसर मिला है। आज की यह शुक्ला त्रयोदशी किसी रूप में आचार्यश्री भिक्षु से भी जुड़ी हुई है। उनका जीवन तो मानों भगवान महावीर से बहुत समानता रखने वाला है। भगवान महावीर का जन्म शुक्ला त्रयोदशी को तो आचार्यश्री भिक्षु का जन्म भी शुक्ला त्रयोदशी को हुआ। भगवान महावीर जब गृहस्थावस्था में थे तो उनका पाणीग्रहण संस्कार भी हुआ था। भगवान महावीर को गृहस्थावस्था में पुत्री की प्राप्ति हुई तो आचार्यश्री भिक्षु को भी पुत्री की प्राप्ति हुई। भगवान महावीर तीर्थ की स्थापना करने वाले आदिकर थे तो आचार्यश्री भिक्षु को तेरापंथ धर्मसंघ के आदिकर के रूप में देखा जा सकता है। दोनों का महाप्रस्थान भी जीवन के आठवें दशक में हुआ। दोनों महापुरुषों की माताओं ने सिंह का स्वप्न देखा था। दोनों महापुरुषों का महाप्रयाण काल चतुर्मासकाल के दौरान ही हुआ है। इतनी समानता का होना भी अपने आप में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

इस अवसर पर आचार्यश्री ने समणीवृंद को लाडनूं से बाहर न भेजने की घोषणा की। योगक्षेम वर्ष का बहुत समाज लगाने का प्रयास हो। गृहस्थ जीवन में भी आहार की शुद्धि रखने का प्रयास होना चाहिए। भगवान महावीर की कल्याणी वाणियों को उपयोग अपने जीवन में करते रहें, यह काम्य है। हमारे चारित्रात्माएं योगक्षेम वर्ष का अच्छा लाभ उठाने का प्रयास करते रहें। ऐसे महापुरुषों के जीवन दर्शन से प्रेरणा मिलती रहे।

योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री प्रमोद बैद ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं ने भगवान महावीर की जन्म जयंती के संदर्भ में गीत का संगान किया।

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